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== कर्मवाद और अदृष्ट, अपूर्व, आश्रव तथा अविज्ञप्ति रूप == कर्म और उसके फल का अनिवार्य संबंध मानने में एक तार्किक कठिनाई उपस्थित होती है। वह यह है कि कर्म और उसके फल में बहुधा अधिक समय का अंतर देखा जाता है। यह भी संभव है कि वर्तमान जीवन में किए हुए कर्मों का फल मनुष्य को दूसरे जन्म में भोगना पड़े। इस प्रकार समय का इतना अधिक अंतर होने के कारण कर्म और फल का संबंध कैसे संभव है? भारतीय दर्शन अदृष्ट, अपूर्व, आश्रव तथा अविज्ञप्ति रूप आदि सिद्धांतों के द्वारा इस समस्या का हल प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते हैं। न्याय के अनुसार, व्यक्ति द्वारा किए हुए कर्मों से उत्पन्न पुण्य और पाप के समूह को अदृष्ट कहते हैं। यह अदृष्ट आत्मा के साथ संयुक्त रहता है और अवसर आने पर सुख दु:ख आदि फलों को उत्पन्न करता है। मीमांसकों के अनुसार, यज्ञ आदि जो किए जाते हैं वे यज्ञकर्ता की आत्मा में एक अदृश्य शक्ति उत्पन्न करते हैं जिसे अपूर्व कहा जाता है। यह अपूर्व आत्मा में रहता है और कालांतर में यज्ञ का अभीप्सित फल उत्पन्न करता है। जैन दर्शन में कर्म और फल के संबंध की व्याख्या जीव में पुद्गल कर्मों अथवा कर्म पुद्गल के आश्रव के सिद्धांत के द्वारा की गई है। इसी प्रकार बौद्ध दर्शन के अनुसार प्राणियों के अंदर एक अत्यंत सूक्ष्म और अदृश्य शक्ति कार्य करती रहती है जिसे अविज्ञप्ति रूप कहते हैं। यही उनके द्वारा किए हुए शुभ अशुभ कर्मों का तदनुसार फल उत्पन्न करती है। इस प्रकार अदृष्ट, अपूर्व, आश्रव तथा अविज्ञप्ति रूप तत्व कर्म और फल के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
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