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== बचाव == पहाड़ी क्षेत्र की ऊबड़खाबड़ भूमि आत्मरक्षा के लिये अत्युत्तम होती है, परंतु बचाव में गहराई नहीं दी जा सकती। बचाव का मुख्य उद्देश्य घाटियों की सड़कों को शत्रु के अधिकार में जाने से रोकना है। सड़कों के बचाव के लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिए जहां प्राकृतिक रचना तथा भूमि की आकृति बचाव में सहायता करे। उदाहरणार्थ, ऐसे ऊँचे स्थान चुनने चाहिए जहां से शत्रु को आगे बढ़ने का दूसरा मार्ग न मिले। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि शत्रु के आगे बढ़ने के अन्य मार्गों पर भी गोली की मार की जा सके। ऊँचे स्थानों या पहाड़ों की चोटियों पर अधिकार करना ही उद्देश्य का अंत नहीं होना चाहिए, अपितु यह भी देखना आवश्यक है कि उन चोटियों से घाटी की पूरी चौकीदारी की जा सके। यदि इन ऊँचे स्थानों से नीचे के मार्गों की देखभाल नहीं की जा सकती तो कई अवसरों पर नीचे की ढालों पर ऐसे स्थान ढूँढ़ने पड़ते हैं जहाँ से पूरी देखभाल की जा सके। ऊबड़ खाबड़ भूमि के बचाव के लिए कम सैनिकों की आवश्यकता होती है, परंतु पर्याप्त रक्षित सेना निकट रखनी चाहिए जिससे प्रत्युत्तर में आक्रमण तेजी से किया जा सके और शत्रु को पराजित किया जा सके। यदि बचाव के लिए मोर्चे पहाड़ के सामने की ढाल पर बनाए जायँ तो उनसे देखभाल अच्छी की जा सकती है और शत्रु के आक्रमण को ऊँचाई की ओर बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है। परंतु इसमें हानि यह है कि ऐसे मोर्चे शत्रु की दृष्टि में रहते हैं। उनपर शत्रु गोली की मार कर सकता है। यदि मोर्चे पहाड़ के शिखर पर बनाए जायँ तो नीचे की ढालों पर ऐसे कई स्थान होते हैं जो देखभाल और गोली की मार से बचे रहते हैं। इस अवस्था में शत्रु सुगमता से ऊँचाई की ओर बढ़ सकता है शिखर पर बनाए हुए मोर्चो का लाभ यह होता है कि वे शत्रु की सीधी मार के भीतर नहीं आते और सहायक सेना को अच्छा छिपाव मिल जाता है। यदि मोर्चे पहाड़ के पीछे की ओर बनाए जायँ तो शत्रु की गोलाबारी से यथेष्ट बचाव हो सकता है, परंतु इन मोर्चों के सामने की ढालों और नीचे घाटी के मार्गों का नियंत्रण एवं निरीक्षण करना कठिन हो जाता है। बचाव को सुदृढ़ करने के लिए मोर्चों के आगे काँटेदार तार और सुरंगे लगाई जाती हैं। शत्रु के आगे बढ़ने के रास्तों पर भी कई प्रकार की बाधाएँ डाली जा सकती हैं, जैसे, नदी नालों के पुल बारूद लगाकर उड़ाना इत्यादि। बचाव में टैंकनाशी तोपें और दूसरा तोपखाना ऐसे स्थानों पर लगाया जाता है जहाँ से वह जिस भूभाग से आक्रमण की आशंका हो उस ओर मार कर सके। वायुयाननाशी तोपखाना ऊँचाई पर लगाना चाहिए जिससे वह चारों ओर भली भाँति देखभाल और मार कर सके। मशीनगनें तंग रास्तों की मार के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। शरद् ऋतु में युद्ध-पहाड़ी क्षेत्र में शरत्कालीन युद्ध बहुत कठिन होता है। ऐसी भीषण परिस्थिति में विशेष प्रशिक्षित सैनिक की आवश्यकता होती है, जो बर्फीले स्थानों पर रह तथा लड़ सकें। इसके अतिरिक्त इन सैनिकों के लिए विशेष प्रकार की युद्धसामग्री का भी प्रबंध करना पड़ता है। असंगठित सेनाओं से युद्ध-कई बार सेनाओं को पहाड़ी क्षेत्र में राजद्रोहियों की असंगठित सेनाओं से युद्ध करना पड़ता है। जैसे भारत के उत्तर-पूर्वीय सीमांत में नागा लोगों के साथ हुआ युद्ध। ये अव्यवस्थित क्षेत्रीय सैनिक युद्धकला में बड़े प्रवीण एवं अनुभवी हैं। ये युद्धसामग्री का कोई विशेष प्रबंध नहीं करते, इसीलिए ये प्राय: गतिमान रहते हैं तथा छापे मारकर युद्ध करते हैं। ऐसे शत्रु पर विजय प्राप्ति के लिए उसी प्रकार की चतुरता एवं युद्धविद्या में प्रवीणता अपेक्षित है। [[श्रेणी:युद्ध]] [[श्रेणी:सुरक्षा]]
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