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== संस्कृत में पद्य-रचना == [[File:Tulsidas composing his famous Avadhi Ramcharitmanas.jpg|thumb|तुलसीदास जी]] संवत् १६२८ में वह हनुमान जी की आज्ञा लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में [[माघ मेला]] लगा हुआ था। वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये। पर्व के छः दिन बाद एक [[बरगद|वटवृक्ष]] के नीचे उन्हें [[भारद्वाज ऋषि|भारद्वाज]] और [[याज्ञवल्क्य]] [[मुनि]] के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी, जो उन्होने सूकरक्षेत्र में अपने गुरु से सुनी थी। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग से पुन: वापस [[काशी]] आ गये और वहाँ के प्रह्लादघाट पर एक [[ब्राह्मण]] के घर निवास किया। वहीं रहते हुए उनके अन्दर कवित्व-शक्ति का प्रस्फुरण हुआ और वे [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में पद्य-रचना करने लगे। परन्तु दिन में वे जितने [[काव्य|पद्य]] रचते, रात्रि में वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान [[शिव|शंकर]] ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में [[काव्य]] रचना करो। तुलसीदास जी की नींद उचट गयी। वे उठकर बैठ गये। उसी समय भगवान [[शिव]] और [[पार्वती]] उनके सामने प्रकट हुए। तुलसीदास जी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इस पर प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा- "तुम अयोध्या में जाकर रहो और हिन्दी में काव्य-रचना करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता [[सामवेद संहिता|सामवेद]] के समान फलवती होगी।" इतना कहकर गौरीशंकर अन्तर्धान हो गये। तुलसीदास जी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशी से सीधे अयोध्या चले गये।
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