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== ग्रन्थकारिता == अथाह विद्वान जैन [[मुनि जिनविजय]]जी ने डॉ॰ दशरथ शर्मा के बारे में कहा था ' उन्होंने अपने जीवन में ऐसा विद्वान नहीं देखा जिसकी इतिहास और साहित्य दोनों में इतनी गहरी पैठ हो'। डॉ॰ शर्मा ने अपने जीवनकाल में करीब पांच सौ लेख इतिहास तथा साहित्य सम्बंधित विषयों पर लिखे थे। इनमे से चार सौ से अधिक लेखों की सूची ''डॉ दशरथ शर्मा लेख संग्रह (प्रथम भाग)'' के रूप में प्रकाशित है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार के. एम्. श्रीमाली के अनुसार प्रत्येक लेख को एक स्वतंत्र शोध कार्य कहा जा सकता है। डॉ॰ शर्मा प्राचीन भारतीय इतिहास के विद्वान थे परन्तु उनका सर्वाधिक शोध कार्य राजपूतकाल पर केन्द्रित रहा<ref>शर्मा, डॉ॰ गिरिजाशंकर, पृष्ठ २४</ref>। १९५९ में प्रकाशित ''अर्ली चौहान डाईनेस्टीस'' आपकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक है। इसमें डॉ॰ शर्मा ने स्पष्ट लिखा है कि चालुक्य साम्राज्य तथा चौहानों में प्रतिस्पर्धा के कारण मुहम्मद ग़ौरी को भारत पर आक्रमण में सफलता प्राप्त हुई<ref>''अर्ली चौहान डाईनेस्टीस'', पृष्ठ ८९, ९९</ref>। राजपूतों में शौर्य अथवा निपुण सेनानियों की कमी नहीं थे परन्तु राजपूत शासकों में सहयोग का अभाव था। इस पुस्तक के उत्तरार्ध में चौहान राज्यों की शासन व्यव्यस्था तथा जीवन पद्धति का वर्णन है। ''लेक्चर्स ऑन राजपूत हिस्टरी एंड कल्चर'' में डॉ॰ शर्मा ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में कहा है कि प्रतिहार रघुवंशी लक्ष्मण के वंशज नहीं थे <ref>''लेक्चर्स ऑन राजपूत हिस्टरी एंड कल्चर'', पृष्ठ १-६</ref>। डॉ॰ शर्मा ने पन्द्रवीं शताब्दी में राजपूतों के पुनरुत्थान पर प्रकाश डालते हुए राणा कुम्भा तथा [[राव जोधा]] के शाषनों का विवरण दिया है<ref>''लेक्चर्स ऑन राजपूत हिस्टरी एंड कल्चर'', पृष्ठ ४६-७५, ८५-९४</ref>। अन्य व्याख्यानों में डॉ॰ शर्मा ने ८००-१००० ई. के राजपूत राज्यों के प्रशासन का वर्णन किया है। ''राजस्थान थ्रू दी एजिज़ (प्रथम भाग)'' में प्रागैतिहासिक काल से अल्लाउद्दीन की मृत्यु तक राजस्थान का इतिहास प्रस्तुत है। इस पुस्तक का प्रथम भाग डॉ॰ सत्यप्रकाश श्रीवास्तव ने लिखा था जिसमे डॉ॰ शर्मा ने आवश्यकतानुसार परविर्तन कर दिया। सन् ७०१ ई.से १३१६ ई. का संपूर्ण भाग डॉ॰ शर्मा द्वारा लिपिबद्ध है। डॉ॰ शर्मा के अनुसार सन् ७०१ ई. के पश्चात राजपूतों ने प्रधानता प्राप्त की तथा ऐतिहासिक राजस्थान का उद्भव हुआ। इस युग का प्रारंभ में म्लेच्छों के भारत पर आक्रमण का उत्तर प्रतिहारों ने दिया<ref>''राजस्थान थ्रू दी एजिज़'' पृष्ठ १२०</ref>। प्रतिहारों के पश्चात चौहान, तोमर तथा गाहडवालों ने ग़ज़नी के आक्रमकारियों का ११९२ ई. तक विरोध किया<ref>''राजस्थान थ्रू दी एजिज़'' पृष्ठ २६१-३००</ref>। डॉ॰ शर्मा के अनुसार राजपूतों की पराजय में जाति व्यवस्था, भारतीय वयामंडल, शास्त्रधर्म का अभिमान, आक्रमणकारियों पर कट्टरपंथी इस्लाम का प्रभाव, बौद्ध और जैन धर्मों द्वारा अहिंसा का प्रचार आदि कारण प्रमुख थे। ''सम्राट पृथ्वीराज चौहान और उनका युग'' आपका चौथा ग्रन्थ है। ''अर्ली चौहान डाईनेस्टीस'' तथा ''राजस्थान थ्रू दी एजिज़'' में पृथ्वीराज चौहान के विषय में जो अपूर्ण रह गया उसकी पूर्ति की गयी है। हिंदी भाषा में लिखित आपका यह एकमात्र ग्रन्थ है<ref>शर्मा, डॉ॰ गिरिजाशंकर पृष्ठ २२</ref>।
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