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=== शिक्षण एवं प्रेरणा === बालक तो अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ मानव शरीर में आया है, इसलिए उसके मन पर पाशविक संस्कारों की छाया रहनी स्वाभाविक है। इसको हटाया जाना आवश्यक है। यदि पशु प्रवृत्ति बनी रही, तो मनुष्य शरीर की विशेषता ही क्या रही है। जिनके अन्तःकरण में मानवीय आदर्शो के प्रति निष्ठा, भावना है, उन्हीं को सच्चे अर्थों में मनुष्य कहा जा सकता है। इन्दि्रय-परायणता, स्वार्थपरता, निरुद्देश्यता, भविष्य के बारे में सोचना, असंयम जैसे दोषों को पशुवृत्ति कहते हैं। इसका जिनमें बाहुल्य हैं, वे नरपशु है। अपना नवजात शिशु नर-पशु नहीं रहना चाहिए, उसके चिर संचित कुसंस्कारों को दूर किया ही जाना चाहिए। इस परिशोधन के लिए संस्कार मण्डप में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम बालक का अभिषेक किया जाता है।
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