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==शब्दावली के विविध सम्प्रदाय== उपर्युक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट होता है कि भारत में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के क्षेत्र में आरम्भ से ही विभिन्न मत परिपुष्ट होते रहे हैं। हिन्दी में पारिभाषिक शब्द निर्माण के क्षेत्र में प्रमुख वाद निम्नलिखित हैं- ===राष्ट्रीयतावादी या पुनरुद्धारवादी सम्प्रदाय=== इस प्रवृत्ति को शुद्धतावादी, प्राचीनतावादी, संस्कृतवादी आदि अनेक नामों से भी अभिहित किया जाता है। इस मत में विश्वास रखने वाले लोग पारिभाषिक शब्दों के लिए या तो [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] से शब्द ग्रहण करना चाहते हैं या संस्कृत के [[उपसर्ग]], [[प्रत्यय]], [[शब्द]], [[धातु]] आदि के आधार पर नए शब्द गढ़ना चाहते हैं। इस विचारधारा के प्रवर्तक डॉ. [[रघुवीर]] थे। उनका मानना था कि जो पारदर्शिता हिन्दी के शब्दों में है वह संसार की अन्य किसी भाषा में नहीं है। संस्कृत के उपलब्ध 22 उपसर्गों, 500 धातुओं और 80 प्रत्ययों की सहायता से लाखों-करोड़ों शब्द बनाए जा सकते हैं। संस्कृत का आधार बनाकर डॉ. रघुवीर ने लाखों शब्दों का निर्माण किया तथा लोग उन्हें 'अभिनव [[पाणिनि|पाणिनी]]' के रूप में देखने लगे। व्यक्तिगत रूप से डॉ. रघुवीर का पारिभाषिक शब्दावली निर्माण सम्बन्धी कार्य उल्लेखनीय है। उन्होंने 'आंग्ल भारतीय महाकोश' चार भाग (इसमें प्रत्येक शब्द का पर्याय देवनागरी, बंगला, कन्नड़ और तमिल लिपियों में भी दिया गया है।) 'वाणिज्य शब्दकोश', 'सांख्यिकी शब्दकोश', 'वैज्ञानिक शब्दकोश', 'अर्थशास्त्र शब्दकोश','तर्कशास्त्र शब्दकोश', 'पक्षिनामावली', 'भेषज-संहिता शब्दकोश', 'मंत्रालय कोश','विविध कोश', 'वानिकी कृषि कोश', 'अंग्रेजी-हिन्दी वृहतकोश' आदि का निर्माण किया। उनकी इच्छा अंग्रेजी के लाखों शब्दों के हिन्दी पर्याय बनाने की थी तथा मृत्यु होने तक वे लगभग 5 लाख शब्दों का निर्माण कर चुके थे। उन्होंने शब्द-निर्माण में संस्कृत को आधार बनाया। डॉ. रघुवीर ने संस्कृत भाषा की शब्द निर्माण की उर्वरा-शक्ति का प्रयोग पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में भरपूर कुशलता के साथ किया है। इस संप्रदाय के विद्वान भारतीय भाषाओं के सारे के सारे शब्द संस्कृत से अपनाने के पक्षधर रहे हैं। ===अन्तरराष्ट्रीयवादी या आदानवादी या शब्द ग्रहणवादी सम्प्रदाय=== इस सम्प्रदाय के समर्थक अनेक प्रमुख भारतीय वैज्ञानिक तथा अंग्रेजी परम्परा के लोग थे। इस सम्प्रदाय के लोगों का मानना है कि अंग्रेजी तथा अन्तरराष्ट्रीय पारिभाषिक शब्दों का ज्यों-का-त्यों, या फिर यत्किंचित अनुकूलित करके हिन्दी में चला लिया जाए। हिन्दी में वैसे भी असंख्य शब्द विदेशी भाषाओं के पहले ही चल चुके हैं। अत: शब्द ग्रहण में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। इस सम्प्रदाय की यह बात एक हद तक तो ठीक थी और उनके अनुसार हिन्दी में अनेक शब्द ग्रहण किए गए तथा ध्वन्यानुकूलन की प्रक्रिया से भी ग्रहण किए गए; यथा-कामदी, त्रासदी, अन्तरिम, तकनीक, नेत्रजन आदि। किसी भी भाषा में, किसी अन्य भाषा के सारे-के-सारे पारिभाषिक शब्द यथावत् पचाए नहीं जा सकते। अत: इस सम्प्रदाय की विचारधारा एक हद तक ही लोगों को रास आई। ===प्रयोगवादी या हिन्दुस्तानी सम्प्रदाय === इस सम्प्रदाय में [[हिन्दुस्तानी भाषा]] के समर्थक पं. सुन्दरलाल, हिन्दुस्तानी कल्चर सोसाइटी, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद आदि रहे हैं तथा इन्होंने इसी विचारधारा के आधार पर पारिभाषिक शब्दों का निर्माण किया है। इस सम्प्रदाय ने हिन्दी और उर्दू का समन्वय करके सरल एवं सहज पारिभाषिक शब्दावली के नाम पर शब्दों की पंचमेल खिचड़ी पकाई है। उदाहरण के लिए - Acknowledgement - रसीदियाना, Extermination - 3150151, Sanitaryसफाईकारी, Emergency - अचानकी, President - राजपति, Psychology - मनविद्या , half heartedness - अधदिलापन, Simplify- आसानियाना आदि। उर्दू व्याकरण के आधार पर कानूनियाना, वाणिज्यियाना, नौबस्तियाना, अणुयाना आदि शब्द भी बनाए गए लेकिन ये शब्द प्रचलित न हो सके। ===लोकवादी सम्प्रदाय=== लोकवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों ने शब्द जनप्रयोग से ग्रहण किए तथा जन प्रचलित शब्दों के योग से शब्द भी बनाए। लेकिन इस तरह आवश्यकतानुरूप संख्या में पारिभाषिक शब्द नहीं बना पाए। वैसे शब्द-निर्माण की लोकवादी प्रणाली हिन्दी भाषा की प्रकृति के अनुकूल थी लेकिन जरूरत के अनुसार इस प्रणाली से शब्द मिले नहीं। कुछ शब्द उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं : Defector - दलबदलू, आयाराम-गयाराम, Infiltrator - घुसपैठिया आदि। Maternity Home - के लिए 'जच्चाघर' तथा Power House के लिए 'बिजलीघर' जन प्रचलन से लिया। ===मध्यममार्गी या समन्वयवादी सम्प्रदाय=== इस सभ्प्रदाय के अनुसार सुविधा की दृष्टि से और हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं की प्रकृति की दृष्टि से अन्तरराष्ट्रीय स्तर की भाषाओं जैसे अंग्रेजी आदि से तथा भारतीय भाषाओं- यथा संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, आधुनिक भारतीय भाषाओं, बोलियों आदि से शब्द ग्रहण किए जा सकते हैं या फिर समन्वय के आधार पर भी शब्द-निर्माण किया जा सकता है। इस विचारधारा का अनुसरण मुख्य रूप से सरकारी शब्द-निर्माण संस्थानों में किया गया। इस विचारधारा में ग्रहण, अनुकूलन और निर्माण पर जोर दिया गया। भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने आरम्भ में पारिभाषिक शब्द निर्माण में जोर दिया कि (क) सर्वप्रथम हिन्दी के उपलब्ध शब्दों को ग्रहण किया जाए, (ख) उसके बाद, हिन्दी में रचे-पचे सभी देशी भारतीय भाषाओं के तथा विदेशी शब्दों को लिया जाए और (ग) यदि फिर भी काम न चले और मजबूरी में किसी अप्रचलित विदेशी शब्द को हिन्दी में ग्रहण करना पड़े तो उसका अनुकूलन कर लिया जाए जैसे - Academy का 'अकादमी', Interim का 'अन्तरिम' आदि। === वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग === मुख्य लेख ''[[वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग]]'' स्वतन्त्रता के बाद वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली के लिए शिक्षा मन्त्रालय ने सन् [[१९५०|1950]] में बोर्ड की स्थापना की। सन् [[१९५२|1952]] में बोर्ड के तत्त्वावधान में शब्दावली निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। अन्तत: [[१९६०|1960]] में [[केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय]] की स्थापना हुई। इस प्रकार विभिन्न अवसरों पर तैयार शब्दावली को 'पारिभाषिक शब्द संग्रह' शीर्षक से प्रकाशित किया गया, जिसका उद्देश्य एक ओर [[वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग]] के समन्वय कार्य के लिए आधार प्रदान करना था और दूसरी ओर अन्तरिम अवधि में लेखकों को नई संकल्पनाओं के लिए सर्वसम्मत पारिभाषिक शब्द प्रदान करना था। ===अखिल भारतीय शब्दावली=== बहुत सारे शिक्षाविदों, भाषा-विज्ञानियों एवं विद्वानों की यह धारणा है कि [[भारत की भाषाएँ|भारतीय भाषाओं]] की तकनीकी शब्दावली ऐसी होनी चाहिए जिसमें सभी भाषाओं में परस्पर समरूपता हो ताकि उच्च शिक्षा अनुसन्धान तथा सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान एवं अन्तर-भाषायी सम्प्रेषण में सुविधा रहे। इस प्रयोजन के लिए भारतीय भाषाओं में एक सर्वनिष्ठ एवं समरूप शब्द भण्डार होना आवश्यक है। चूँकि देश के विभिन्न राज्यों की भाषाओं में तकनीकी शब्दों के मूलरूप प्रायः एक समान हैं, अतः अनेक शब्दों में आपस में समानता दृष्टिगत होती है। समय की इस माँग को ध्यान में रखते हुए आयोग ने विज्ञान तथा तकनीकी से सम्बन्धित आधारभूत शब्दों के अखिल भारतीय पर्यायों की पहचान करने अथवा पर्याय निर्धारित करने की योजना पर काम करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए 1979 में [[बंगलौर विश्वविद्यालय]] में अखिल भारतीय शब्दावली (Pan Indian Terminology) विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की। इस संगोष्ठी में अखिल भारतीय शब्दावली विषय पर चर्चा हुई और इससे सम्बन्धित आवश्यक दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए। ====अखिल भारतीय शब्दावली पहचान के सामान्य पक्ष==== वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठियों में विचार-विमर्श के दौरान कुछ सामान्य पक्ष भी उभर कर सामने आए। ये पक्ष थे, जिन्हें आधार रूप में स्वीकार करने पर अखिल भारतीय शब्दावली निर्धारण में मदद मिलती है। आयोग ने इन्हीं पक्षों के आलोक में अखिल भारतीय शब्दावली सम्बन्धी कार्य को आगे बढ़ाया। आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. मलिक मोहम्मद ने भौतिकी की अखिल भारतीय शब्दावली की प्रस्तावना में इन पक्षों को उजागर किया है। उनके अनुसार ये पक्ष हैं *(१) अन्तरराष्ट्रीय शब्द सभी को मान्य हैं। *(२) अधिकांश ऐसे संस्कृत शब्द जो विभिन्न भारतीय भाषाओं में बहुत अलग-अलग अर्थ नहीं देते, अखिल भारतीय स्तर पर प्रयोग के लिए स्वीकृत कर लिए जाते हैं। *(३) फारसी-अरबी से उद्धृत शब्द जो पहले से ही प्रचलित हैं, अधिकांश भारतीय भाषाओं द्वारा मान्य हैं। *(४) यदि कोई शब्द किसी एक भी भाषा में अनादरसूचक अर्थ का बोधक है तो वह एकदम अस्वीकृत कर दिया जाता है। *(५) यदि किसी भाषा को कोई विशेष शब्द इसलिए मान्य नहीं होता क्योंकि उसके स्थान पर पहले से कोई क्षेत्रीय शब्द इतना प्रचलित है कि उसे बदलना असम्भव है तो ऐसी स्थिति में अपवादस्वरूप उस भाषा को अपने पूर्व-प्रचलित शब्द का प्रयोग करते रहने की छूट दे दी जाती है। ====अखिल भारतीय शब्दावली की निर्माणपद्धति==== अखिल भारतीय शब्दावली निर्माण के लिए जिस पद्धति को अपनाया गया, उसमें सबसे पहले प्रयास यह किया गया कि वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग विषय-विशेष की आधारभूत शब्दावली की सूची को अंग्रेजी में तैयार करता। यह सूची उन शब्दों का संकलन होती, जिन्हें अखिल भारतीय प्रयोग के लिए स्वीकार किया जा सकता था। उसके बाद तैयार सूची की प्रतियाँ देश के सभी राज्य पाठ्य पुस्तक मण्डलों को इस अनुरोध के साथ भेजी जातीं कि वे इस सूची को अपने भाषायी क्षेत्र में किसी ऐसे विद्वान के पास भेजें जो विषय-विशेष का विशेषज्ञ तो हो ही, साथ ही वह अपनी भाषा में उस विषय विशेष में व्यवहत/प्रयुक्त होने वाले वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दों से भली प्रकार से परिचित भी हों। वह विशेषज्ञ उसी सूची में शामिल अंग्रेजी में लिखित तकनीकी शब्दों के पर्याय अपनी भाषा में से संकलित करता और फिर उन्हें आयोग के पास भेज देता। भाषायी क्षेत्र की दृष्टि से ये स्वयं में मानक पर्याय होते। लेकिन इतना कार्य करके वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा अखिल भारतीय शब्दावली के पर्याय निश्चित निर्धारित नहीं कर लिए जाते। सभी राज्य पाठ्य पुस्तक मण्डलों से प्राप्त सूचियों में शामिल अंग्रेजी शब्दों के मानक पर्यायों को सारणीबद्ध करके उन्हें अखिल भारतीय संगोष्ठियों में भी प्रस्तुत किया जाता था। इन सूचियों में आयोग द्वारा उन शब्दों के लिए अनुमोदित पर्याय भी दिए रहते थे। इन संगोष्ठियों में राज्य पाठ्य पुस्तक मण्डलों द्वारा नामित विद्वान और कुछ भाषाविद आमन्त्रित किए जाते थे। ये संगोष्ठियाँ देश के विभिन्न स्थलों पर आयोजित की जाती थीं। संगोष्ठियों में आमन्त्रित विद्वान सारणीबद्ध पर्यायों में से उस शब्द को चुनने की कोशिश करते जो देश की सभी अथवा अधिकांश भाषाओं में स्वीकार्य हो। इसके अलावा, ऐसा भी होता कि यदि उपलब्ध पर्यायों में से कोई पर्याय कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो संगोष्ठियों में आमन्त्रित भाषाविद ऐसा नया पर्याय 'गढ़ने में मदद करते जो अखिल भारतीय स्तर पर व्यवहार में लाया जा सके। इस तरह अखिल भारतीय शब्दावली के पर्याय निर्धारित किए जाते। उक्त प्रक्रिया को अपनाकर आयोग ने संगोष्ठियों, प्रमुख विषय विशेषज्ञों और भाषा विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में अखिल भारतीय शब्दावलियाँ निर्मित करने की दिशा में कार्य आरम्भ किया। इस प्रकार संकलित विभिन्न विषयों के शब्द 'अखिल भारतीय शब्दावली' कहलाते हैं। आयोग ने सबसे पहले 1985 में 'अखिल भारतीय शब्दावली-खगोलिकी' प्रकाशित की। इसके पश्चात अर्थशास्त्र और वाणिज्य, भूगोल, गणित, समाजविज्ञान एवं सांस्कृतिक विज्ञान (सभी 1986 में), भौतिकी (1987), जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान, भाषा विषान, समुद्रविज्ञान, और भूविज्ञान, (1990), शिक्षा, मनोविज्ञान तथा मनोरोगविज्ञान, सांख्यिकी (1991), प्रायोगिक भूगोल (1992), सिविल इंजीनियरी, मानव भूगोल (1993), भूविज्ञान (1995) आयुर्विज्ञान (1996) आदि विषयों की अखिल भारतीय शब्दावलियां प्रकाशित की गई। आयोग इन शब्दावलियों को देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के विभिन्न विषयों के प्राध्यापकों, भाषाविदों, लेखकों, अनुवादकों, कोशकारों, पत्रकारों एवं राज्य के पाठ्य-पुस्तक निर्माण मण्डलों को निःशुल्क वितरित करता है। इसके अलावा, आयोग ने उक्त सभी अखिल भारतीय शब्दावलियों को एक ग्रन्थ में उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया। आयोग ने इसे 'समेकित अखिल भारतीय शब्द संग्रह' (Comprehensive Glossary of Pan-indian Terms) नाम से वर्ष 2002 में हरियाणा साहित्य अकादमी के तत्वावधान में प्रकाशित किया। वह अंग्रेजी-रोमन-हिन्दी में तैयार किया गया शब्द-संग्रह है।
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