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=== [[विवेकवाद]]=== '''[[रेने देकार्त|देकार्त]]''' (1596-1650) ने सामयिक सन्देह से आरम्भ किया। तुरन्त ही उसे पता लगा कि यह संदेह स्वयं संदेह का विषय नहीं हो सकता। उसका पहला संदिग्ध बोध यह था- : "मैं चिन्तन करता हूँ, इसलिए मैं हूँ।" ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]] : I think, therefore I am; या, I am thinking, therefore I exist) अधिक विचार से वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परमात्मा और भौतिक जगत् का अस्तित्व भी विमल और स्पष्ट चिंतन का फल है और इसलिए असंदिग्ध तथ्य हैं। सारी सत्ता दो प्रकार की है - पुरुष और प्रकृति। ये दोनों द्रव्य हैं - सर्वथा एक दूसरे से भिन्न। पुरुष का गुण चेतना है, प्रकृति का गुण विस्तार या फैलाव है। इन दोनों का भेद भेद की पराकाष्ठा है। '''[[बारूथ स्पिनोज़ा]]''' (1632-1677) ने कहा कि द्रव्य के प्रत्यय में अनंतता निहित है। अनंत एक ही हो सकता है, समग्र ही अकेला द्रव्य है। अनन्त (द्रव्य) के अनन्त गुण हैं, परन्तु मनुष्य केवल दो गुणों, चिन्तन और विस्तार, के विषय में जान सकता है। चिंतन के विविध आकार आत्मा या जीव कहलाते हैं; विस्तार के आकार भौतिक पदार्थ हैं। इन दोनों में कारण-कार्य का संबंध नहीं, केवल समानांतरता है। एकमात्र कारण तो समग्र या ईश्वर ही है; मनुष्य अनिवार्यता के अधीन हैं। अनिवार्यता की स्वीकृति ही स्वधीनता है। उद्वेगों को समझना, उन्हें आनंद और प्रेम के शासन में करना यही मनुष्य का लक्ष्य है, इसी को ईश्वरप्रेम कहते हैं। '''[[गाटफ्रीड लैबनिट्ज़|लाइबनिज़]]''' (1646-1716) ने कहा कि द्रव्य एक नहीं, परन्तु एक प्रकार के हैं। उसने मौलिक द्रव्य को चिद् बिंदु का स्पष्ट सम्पर्क किसी दूसरे चिद् बिंदु से नहीं होता। आरम्भ में ही परमात्मा ने उनमें ऐसा सामंजस्य उत्पन्न कर दिया कि प्रत्येक का आत्मबोध उसे बता देता है कि दूसरों की आत्माओं में क्या हो रहा है। एक निपुण घड़ी बनाने वाले की बनाई हुई घड़ियाँ एक दूसरे को प्रभावित नहीं करतीं, परन्तु सभी एक ही समय दिखाती हैं। [[रेने देकार्त|देकार्त]] ने द्वैतवाद को, स्पिनोजा ने अद्वैतवाद का और लाइबनिज़ ने आध्यात्मिक अनेकवाद को अपनाया।
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