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प्रथम चीन-जापान युद्ध
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==युद्ध का आरंभ== 1891 ई. में रूस ने फ्रांस से कर्ज लेकर 3500 मील लंबी [[पार-साइबेरियाई रेलमार्ग|ट्रांस साइबेरियन रेलवे]] बनाने का निश्चय किया। इसके लिए वह दक्षिण कोरिया में अड्डा बनाना चाहता था। इससे जापान के कान खड़े हो गए। इसी बीच कोरिया में 1894 ई. में एक विद्रोह हो गया। तोंगहाक दल के नेतृत्व में हुआ यह विद्रोह मुख्यतः विदेशियों के खिलाफ हुआ था। शाही फौज इसे दबाने में असमर्थ रही। अतएव, उसने चीन से मदद माँगी। चीन की सरकार ने चीनी सैनिकों का एक दस्ता भेज दिया, किंतु 1885 ई. के समझौते के अनुसार जापान को इसकी सूचना पहले न देकर बाद में दी। जापान ने विरोध किया कि इतनी बड़ी संख्या में चीन के सैनिकों का कोरिया में पहुँचना संधि की शर्तां के विरूद्ध था। बदले में जापानी शासकों ने भी चीन को विधिवत सूचित कर सात हजार सैनिक कोरिया भेज दिए। चीन और जापान की सेनाओं के कोरिया में घुसने के पहले ही कोरिया की सरकार ने बलवे को दबा दिया। किन्तु कोरिया की भूमि पर दो विदेशी सेनाएँ डटी रहीं। ऐसा प्रतीत हुआ कि दोनों के मध्य किसी भी क्षण युद्ध छिड़ जाएगा। अगस्त 1894 ई. में एक चीनी जहाज चीनी सैनिकों सहित कोरिया की ओर जा रहा था। जापान ने मार्ग में ही उसे पकड़ लिया और, चूँकि उक्त जहाज ने आत्मसमर्पण नहीं किया, अतः उस पर आक्रमण कर दिया गया, फलस्वरूप प्रत्येक चीनी यात्री समुद्र में डुबो दिया गया। इस घटना से क्षुब्ध होकर चीन ने 1 अगस्त, 1894 को जापान के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और इस प्रकार प्रथम चीन-जापान युद्ध आरंभ हो गया।
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