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== रसायन के लिए समर्पित जीवन == आचार्य राय एक समर्पित कर्मयोगी थे। उनके मन में [[विवाह]] का विचार भी नहीं आया और समस्त जीवन उन्होंने [[प्रेसिडेन्सी विश्वविद्यालय|प्रेसीडेंसी कालेज]] के एक नाममात्र के फर्नीचर वाले कमरे में काट दिया। प्रेसीडेंसी कालेज में कार्य करते हुए उन्हें तत्कालीन महान फ्रांसीसी रसायनज्ञ [[मर्सेलीन बर्टलो|बर्थेलो]] की पुस्तक "द ग्रीक एल्केमी" पढ़ने को मिली। तुरन्त उन्होंने बर्थेलो को पत्र लिखा कि [[भारत]] में भी अति प्राचीनकाल से रसायन की परम्परा रही है। बर्थेलो के आग्रह पर आचार्य ने मुख्यत: [[नागार्जुन]] की पुस्तक "रसेन्द्रसारसंग्रह" पर आधारित प्राचीन [[हिन्दू रसायन]] के विषय में एक लम्बा परिचयात्मक लेख लिखकर उन्हें भेजा। बर्थेलाट ने इसकी एक अत्यंत विद्वत्तापूर्ण समीक्षा "जर्नल डे सावंट" में प्रकाशित की, जिसमें आचार्य राय के कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी। इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अंतत: अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "[[हिंदू रसायन का इतिहास|हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री]]" का प्रणयन किया जो विश्वविख्यात हुई और जिनके माध्यम से प्राचीन भारत के विशाल रसायन ज्ञान से समस्त संसार पहली बार परिचित होकर चमत्कृत हुआ। स्वयं बर्थेलाट ने इस पर समीक्षा लिखी जो "जर्नल डे सावंट" के १५ पृष्ठों में प्रकाशित हुई। १९१२ में [[इंग्लैण्ड]] के अपने दूसरे प्रवास के दौरान [[डरहम विश्वविद्यालय]] के कुलपति ने उन्हें अपने विश्वविद्यालय की मानद डी.एस.सी. उपाधि प्रदान की। रसायन के क्षेत्र में आचार्य ने १२० शोध-पत्र प्रकाशित किए। [[मरक्यूरस नाइट्रेट]] एवं [[अमोनियम नाइट्राइट]] नामक यौगिकों के प्रथम विरचन से उन्हें अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।
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