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== प्रजननांगों के सहज विकार == (1) '''बीजग्रंथियाँ''' - ग्रंथियों की रुद्ध वृद्धि (Hypoplasea) पूर्ण अभाव आदि विकार बहुत कम उपलब्ध होते हैं। कभी-कभी अंडग्रंथि तथा बीजग्रंथि सम्मिलित उपस्थित रहती है तथा उसे अंडवृषण (ovotesties) कहते हैं। (2) '''बीजवाहिनियाँ''' - इनका पूर्ण अभाव, आंशिक वृद्धि, तथा इनका अंधवर्ध (diverticulum) आदि विकार पाए जाते हैं। (3) '''गर्भाशय''' - इस अंग का पूर्ण अभाव कदाचित् ही होता है * गर्भाशय में दो शृंग, एवं दो ग्रीवा होती है तथा दो योनि होती हैं अर्थात् दोनों म्यूलरी वाहिनी परस्पर विगल-विगल रहकर वृद्धि करती है। इसे डाइडेलफिस (didelphys) गर्भाशय कहते हैं। * इस तरह वह अवस्था जिसमें म्यूलरी वाहिनियाँ परस्पर विलग रहती हैं परंतु ग्रीवा योनिसंधि पर संयोजक ऊतक द्वारा संयुक्त होती है उसे कूट डाइडेल फिस कहते हैं। * कभी गर्भाशय में दो शृंग होते हैं जो एक गर्भाशय ग्रीवा में खुलते हैं। * कभी गर्भाशय स्वाभाविक दिखाई देता है परंतु उसकी तथा ग्रीवा की गुहा, पट द्वारा विभाजित रहती है। यह पट पूर्ण तथा अपूर्ण हो सकता है। * कभी कभी छोटी छोटी अस्वाभाविकताएँ गर्भाशय में पाई जाती हैं जैसे शृंग का एक ओर झुकना, गर्भाशय का पिचका होना आदि। * शैशविक आकार आयतन का गर्भाशय युवावस्था में पाया जाता है क्योंकि जन्म के समय से ही उसकी वृद्धि रुक जाती है। * अल्पविकसित गर्भाशय में गर्भाशय शरीर छोटा तथा ग्रेवेय ग्रीवा लंबी होती है। (4) '''गर्भाशय ग्रीवा''' - (क) ग्रीवा के बाह्य एवं अंत:मुख का बंद होना। (ख) योनिगत ग्रीवा का सहज अतिलंब होना एवं भग तक पहुँचना। (5) '''योनि''' - योनि कदाचित् ही पूर्ण लुप्त होती है। योनिछिद्र का लोप पूर्ण अथवा अपूर्ण, पट द्वारा योनि का लंबाई में विभाजन आदि प्राय: मिलते हैं। (6) इसमें अत्यधिक पाए जानेवाले सहज विकारों में योनिच्छद का पूर्ण अछिद्रित होना या चलनी रूप छिद्रित होना होता है।
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