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=== तैत्तिरीय प्रातिशाख्य === इसका संबंध कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से है। यह भी सूत्रशैली में निर्मित है। इसमें 24 अध्याय हैं। सामान्य प्रातिशाख्यीय विषय के साथ साथ इसमें (अध्याय तीन और चार में) पदपाठ की विशेष चर्चा की गई है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसमें 20 प्राचीन आचार्यों का उल्लेख है। इसकी कई प्राचीन व्याख्याएँ, त्रिभाष्यरत्न प्रसिद्ध हैं। इसका प्रोफेसर ह्विटनी (W.D. Whitney) कृत अंग्रेजी अनुवाद (1871) उपलब्ध हैं।
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