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===अफ़ग़ान आक्रमणकारियों से झड़प एवं कश्मीर और हज़ारा के मुस्लिम बाग़ी कबीलों से मुठभेड़=== {{मुख्य|जमरूद की लड़ाई}} १८३७ में अफ़ग़ानों ने सिखों के जमरूद क़िले पर हमला किया था, जिसमें [[महाराजा रणजीत सिंह|महाराज रणजीत सिंह]] ने "राजा" गुलाब सिंह के नेत्रित्व में सहायक सेना भेजी थी। कुछ दिनों की झड़प के बाद सिखों ने [[अफ़ग़ान लोग|अफ़ग़ानों]] को रोक दिया, पर [[जमरूद की लड़ाई]] में [[सरदार हरि सिंह नलवा|हरि सिंह नलवा]] की हत्या हो गई, जिसके बाद [[कश्मीर]] और [[हज़ारा]] में कई मुस्लिम कबीलों ने राजविद्रोह की घोशणा कर दी। इनमें तनोली, कर्राल, धुन्द, साती और सुधान शामिल थे। [[महाराजा रणजीत सिंह|महाराज रणजीत सिंह]] ने [[महाराज गुलाब सिंह|गुलाब सिंह]] को विद्रोह और विद्रोहियों पर नकेल कसने का काम सौंपा था। दस्तावेज़ों और प्रतिवेदनों के मुताबिक़ वे १०,००० सिख और डोगरा सैनिकों के साथ हज़ारा पहुंचे थे। हज़ारा और मुर्री पहाड़ियों में विद्रोहियों को हराने के बाद, कश्मीर में बाग़ियों के खिलाफ़ अभियान के नेत्रित्व के लिये अपना मुख्य डेरा [[कठुआ]] को बनाया। एक सुधान, शम्स ख़ान वहां विद्रोह का स्तर बढ़ा रखा था, और कई सैन्य छावनियों और किलों पर कब्ज़ा भी कर रखा था। ऐसा जाना जाता है, की गुलाब सिंह ने विद्रोह से संबंधित प्रतायेक बाग़ी के सर के लिया "एक रूपय का ईनाम" रखा था। इसी प्रकार पहाड़ियों में करीब १२,००० सुधान, साती और धुन्द लोगों का संहार किया गया था। साथ ही कुछ [[मुसलमान]] महिलाओं को बंदी बला कर [[यौनदास|यौनदासी]] के रूप में भी बेच दिया गया था।
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