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== अभिघातज व्याधियाँ == (१) कभी कभी गिरने से, या कुप्रसव के कारण, योनिपथ विदीर्ण हो जाता हैं, अत: सिलाई करने से तथा व्रण-रोण चिकित्सा से लाभ होता है। (2) '''युरेथ्रोसील तथा सिस्टोसील''' - योनिपथ की पूर्वी दीवार प्रसव के सतत अधातों से, या जन्मजात कमजोर होने से, ढीली हो जाती है। यह दीवार मूत्रनलिका को, या मूत्राशय को लेकर योनि में लटकने लगती हैं तथा खाँसने आदि में योनि में उभार अधिक होता हैं। कभी कभी रोगवृद्धि होने पर मूत्राशय में रुकावट तथा कष्ट होने लगता है। इसकी शल्य कर्म से चिकित्सा की जाती है। (3) '''रेक्ओसील'''- योनिपथ की पश्चिमी दीवार प्रसव के आधातों से ढीली होकर मूत्राशय को साथ लेकर योनि में लटकने लगती है इसकी शल्यकर्म द्वारा चिकित्सा की जाती है। (4) '''मूत्राशय-योन नाड़ीव्रण (fistula)'''- [[मूत्राशय]] का निचा हिस्सा प्रसव के समय आधात से, अथवा दुर्दभ्य अर्बुद से विदीर्ण हो जाता है और मूत्र हर समय योनिपथ से टपकता रहता है। निदान के लिये कैथेटर से मूत्राशय में कोई रंग डाल दिया जाता है तथा नाड्व्ऱीाण के बाह्य मुख से इसे निकलता देखा जा सकता हैं। शल्यचिकित्सा द्वारा यह रोग साध्य है।
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