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== वर्ष में केवल एक दिन == जब [[हिन्दुस्तान]] को 1947 में विभाजित होकर आजादी मिली लालाजी ने हवेली से बाहर निकलना छोड़ दिया। वे वर्ष में केवल एक दिन 15 अगस्त को सज-धज कर घर से बाहर निकलते थे, [[लाल किला|लाल किले]] तक जाते थे, प्राचीर पर फहरता हुआ तिरंगा देखते थे, [[जवाहरलाल नेहरू|नेहरू जी]] का भाषण सुनते थे और वापस आकर अपनी हवेली की उसी गुमनाम कोठरी में घुस जाते थे। एक बार उनसे इसका कारण जानना चाहा तो लालाजी ने बड़ी ही शिद्दत से उत्तर दिया था - "मैं यह देखने जाता हूँ कि जिन्होंने हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में क्रान्तिकारियों के साथ दगा किया वे लाल किले की प्राचीर से लच्छेदार भाषण देते हुए कैसे लगते हैं?"<ref name="">{{cite book |last1=क्रान्त |first1= |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास |url=http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |format= |accessdate= |edition=1 |series= |volume=1 |date= |year=2006 |month= |origyear= |publisher=प्रवीण प्रकाशन |location=नई दिल्ली |language=hi |isbn=81-7783-119-4 |oclc= |doi= |id= |page=241 |pages= |chapter= |chapterurl= |quote= |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp= |archive-url=https://web.archive.org/web/20131014175453/http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |archive-date=14 अक्तूबर 2013 |url-status=live }}</ref> लाला हनुमन्त सहाय एक भारतीय क्रान्तिकारी थे। वे 1907 में [[सूफी अंबा प्रसाद भटनागर|सूफी अम्बा प्रसाद]] के नेतृत्व में बनी भारत माता सोसायटी के सक्रिय सदस्य थे<ref name="जगेश2">{{cite book|url=|title=कलम आज उनकी जय बोल|last1=जगेश|first1=जगदीश|last2=|first2=|date=|publisher=हिन्दी प्रचारक संस्थान|others=|year=1989|isbn=|editor1-last=|editor1-first=|editor1-link=|edition=|series=|volume=|location=वाराणसी|page=77|pages=|language=hi|chapter=|format=|bibcode=|doi=|oclc=|id=|quote=|ref=|postscript=|authorlink1=|accessdate=|origyear=|chapterurl=|laysummary=|laydate=|lastauthoramp=|separator=|month=}}</ref>। चाँदनी चौक दिल्ली में अंग्रेज वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के षड्यन्त्र में उन्हें भी सह-अभियुक्त<ref name="जगेश">{{cite book |last1=जगेश |first1=जगदीश |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=कलम आज उनकी जय बोल |url= |format= |accessdate= |edition= |series= |volume= |date= |year=1989 |month= |origyear= |publisher=हिन्दी प्रचारक संस्थान |location=वाराणसी | language = hi |isbn= |oclc= |doi= |id= |page=103 |pages= |chapter= |chapterurl= |quote= |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp=}}</ref> बनाया गया। न्यायालय ने उन्हें आजीवन कालेपानी की सजा दी जो बाद में अपील किये जाने पर सात वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी गयी।<ref name="hindu2">{{cite web|url=http://www.hindu.com/mp/2004/08/02/stories/2004080200420200.htm|title=The revolutionary of Chandni Chowk|date=2004-08-02|publisher=द हिन्दू|archive-url=https://web.archive.org/web/20121025215013/http://www.hindu.com/mp/2004/08/02/stories/2004080200420200.htm|archive-date=25 अक्तूबर 2012|accessdate=2012-06-15|url-status=live}}</ref> वे जाति के [[कायस्थ]] थे जिसके कारण सभी लोग उन्हें "लाला जी" कहकर सम्बोधित करते थे। उन्हें अन्तिम बार [[चाँदनी चौक, दिल्ली|चाँदनी चौक, दिल्लीवे]] अपनी पैतृक हवेली में रहते थे।दो पुत्रों के परिवार के साथ रहते हुए भी वे पारिवारिक जीवन से प्रायः विरक्त रहते थे ।परिजन और गणमान्य लोग उनसे मिलने आते रहते थे और घंटों विविध विषयों पर चर्चा करते थे।उनका अधिकांश समय पुस्तकें पढ़ने में बीतता।शाम को एक घंटे सैर करते थे ।अपने बगीचे की देखरेख वे स्वयं करते थे।ज्ञान के अपार भंडार थे ।राजनीति,इतिहास लेकर दर्शन तक में गहरी पैठ थी ।जेल जीवन की लोमहर्षक यातनाएँ सुननेवालों पर अमिट प्रभाव डालती थीं।लार्ड गार्डिंग पर फेंका गया बम उन्हीं की हवेली के तहख़ाने में बनाया गया था ।<ref name="hindu2" />
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