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== यज्ञोपवीत परिवतर्न == नये जीवन की ओर पहला कदम त्याग, पवित्रता, तेजस्विता एवं परमार्थ के प्रतीक व्रतबन्ध स्वरूप यज्ञोपवीत का नवीनीकरण किया जाता है। यज्ञोपवीत का सिंचन करके पाँच देव शक्तियों के आवाहन स्थापन के उपरान्त उसे धारण कर लिया जाता है, पुराना उतार दिया जाता है। यह क्रम यज्ञोपवीत संस्कार प्रकरण में भी दिया गया है। ;यज्ञोपवीत सिंचन मन्त्र बोलते हुए यज्ञोपवीत पर जल छिड़कें, पवित्र करें, नमस्कार करें- ॐ प्रजापतेयर्त्सहजं पवित्रं, कापार्ससूत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम्॥ ब्रह्मत्वसिद्ध्यै च यशः प्रकाशं, जपस्य सिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्र॥ ;पंचदेवावाहन निम्नस्थ मन्त्रों के साथ यज्ञोपवीत में विभिन्न देवताओं का आवाहन करें- (१) ब्रह्मा- ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्, विसीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्याऽउपमाऽ अस्यविष्ठाः, सतश्चयोनिमसतश्च विवः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१३.३ (२) विष्णु - ॐ इदं विष्णुविर्चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा सुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -५.१५ (३) शिव - ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽ, उतो तऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥ ॐ रुद्राय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१६.१ (४) यज्ञपुरुष - यज्ञोपवीत खोल लें। दोनों हाथों की कनिष्ठा और अँगूठे से फँसाकर सीने की सीध में करें, फिर यज्ञ भगवान का आवाहन मन्त्र बोलते हुए यज्ञ पुरुष का पूजन करें। ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। तेह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः॥ ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥ -३१.१६ (५) सूर्य - फिर दोनों हाथ ऊपर उठाकर सूयर्देव का आवाहन करें- ॐ आकृष्णेन रजसा वत्तर्मानो, निवेशयन्नमृतं मत्यर्ं च। हिरण्ययेन सविता रथेना, देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ ॐ सूयार्य नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -३३.४३ ;यज्ञोपवीतधारण ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ -पार०गृ०सू० २.२.११ ;जीणोर्पवीत विसजर्न ॐ एतावद्दिन पयर्न्तं, ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीणर्त्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र यथासुखम्॥ ;पंचगव्यपान === शिक्षण और प्रेरणा === पंचगव्य का पान पिछले जीवन में हुई भूलों के प्रायश्चित के लिए कराया जाता है। मैल हटे तो रंग चढ़े, दोषों की स्वीकारोक्ति, उनसे सम्बन्ध विच्छेद, जो प्रवृत्तियाँ इस ओर तो ले जाती है, उनका नियमन, भूलों से हुई हानियों को पूरा करने का साहस भरा शुभारम्भ यह सब मिलकर प्रायश्चित कर्म् पूरा होते हैं। प्रायश्चित से शुद्ध चित्त पर देव अनुग्रह सहज ही बरस पड़ते हैं। === क्रिया और भावना- === पंचगव्य की कटोरी बायें हाथ में ले और दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली से मन्त्रोच्चार के साथ उसे घोलें-चलाएँ। भावना करें कि इन गौ द्रव्यों को दिव्य चेतना से अभिमन्त्रित कर रहे हैं। ॐ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं, दधि सप्पिर्ः कुशोदकम्। निदिर्ष्टं पंचगव्यं, तु पवित्रं मुनिपुंगवैः॥ कटोरी दाहिने हाथ में लेकर मन्त्रोच्चार के साथ पान करें। भावना करें कि दिव्य संस्कारों से पापों की जड़ पर प्रहार और पुण्यों को उभारने का क्रम आरम्भ हो रहा है, जो निष्ठापूवर्क चलाया जाता रहेगा। ॐ यत्त्वगस्थिगतंपापं, देहे तिष्ठति मामके। प्राशनात्पंचगव्यस्य, दहत्वग्निरिवेन्धनम्॥
सारांश:
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