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===प्राचीन काल=== एक देश, काल में अनेक विधिकार हों इसकी संभावना कम होती है। [[रोम]] में डेसेंवीरी (The Decemviri) ने रोम के 12 सूत्रों (twelve tables) की रचना की लेकिन उसे विधिकार नहीं माना जाता है। लेकिन कुछ शासकों ने विशेष प्रकार की विधियों की रचना की, उन्हें विधिकार माना जाता है। इस श्रेणी में जस्टीनियन के कार्पस जूरिस (Corpus juris), नेपोलियन की संहिता (Code Napoleon) को कानून या विधि माना जाता था और उनके निर्माता विधिकार माने जाते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि विधिकार को उसके समसामयिक भी विधिकार मानें। ड्राको (Draco) को उसके अपने समय में केवल एक विशेष न्यायाधीश माना जाता था लेकिन उसकी व्यवस्थाओं ने बाद में विधि का रूप ले लिया और उसे विधिकार माना जाने लगा। थिओडोसियस द्वितीय (Theodosius II) ने संहिता की रचना की, उसे भी अब विधिकार माना जाता है। विधिकार और न्यायाधीश का संबंध भी विचित्र है। पुराने जर्मन विधिकार न्यायाधीश होते थे। विधिकार को न्यायमूर्ति कहा जाता है। हम्मूराबी की संहिता में न्याय देने का उल्लेख है जिसका तात्पर्य यह है कि उस समय के नरेश न्याय देते थे। यूनान का ड्राको (Darco) न्यायाधीश (Themothetes) था। रोम के विधिशास्त्री अपने नरेशों को विधिकार की अपेक्षा विधि का व्याख्याकार अधिक मानते थे। विधिकार और न्यायाधीश दोनों की समानता का यह कारण है कि जर्मन और आंग्ल अमरीकी विधिशास्त्रों में यह स्वीकार किया जाता है कि न्यायाधीश ईश्वरीय प्रेरणा से विधि का निर्माण करता है अत: वह स्वयं विधिकार है। विधिकारों ने जिन विधियों की रचना की उनमें बहुत अंतर है, चाहे वे विधियाँ हजरत मूसा, हजरत मुहम्मद आदि धार्मिक नेताओं की रचना हों अथवा उनकी रचना रामुलस (Romulus) अथवा लाइकरगस (Lycurgus) जैसे सामरिक नेताओं ने की हो अथवा हम्मुरावी संहिता और ड्राको की व्यवस्था में दंडव्यवस्था के रूप में विधि की रचना हुई हो अथवा मनुसंहिता के रूप में एक आदर्श सिद्धांत की स्थापना की गई हो। आधुनिक शोधों से मिले परिणामों के अनुसार सभी विधिकार अपनी समसामयिक परंपराओं, न्यायाधीशों की व्यवस्थाओं और मान्य अधिनियमों को ही विधियों का रूप प्रदान करते रहे हैं। यह बात हम्मूराबी, संहिता और मूसा के दस सिद्धांतों पर लागू होती है। जस्टीनियन तो स्वयं यह स्वीकार करता है कि समसामयिक अधिनियम और न्यायाधीशों की व्यवस्थाओं के आधार पर उसने विधिरचना की। मान्य विधिकारों के अतिरिक्त ऐसी अनेक विधिपुस्तकें मिलती हैं जिन्हें विधिशास्त्र की अच्छी रचनाएँ कहा जा सकता है और कुछ लोग ऐसे विधिशास्त्रियों को भी विधिकार की श्रेणी में रखना चाहते हैं। लगश के सुमेरियाई नरेश "उरुकगीना" (Urukagina) (अनुमानत: ई. 2750 ई. पू.), वेबीलोन के शासक नबूनायद (Nabunaid, अनुमानत: 556-539 ई. पू.) अपने समय के महत्वपूर्ण विधिकार माने जाते हैं। बेवीलोन के हम्पूराबी शासक की संहिता का तो सबसे अधिक महत्व है। इसका कालनिर्णय अभी नहीं हो सका है। असीरियाई विधिपुस्तकों और हिटाइट संहिता (Hittite code, अनुमानत: 1350 ई. पू.) की रचना करनेवाले विधिकारों का ठीक पता नहीं चला है। यूनानी लेख डियोडोरस (Diodorus) ने मिस्र के फराओह मैनेस (Pharaohs Menes, अनुमानत: 3400 ई. पू.), रामसेस द्वितीय (Ramses II, 1292-1225 ई. पू.), वोकोरिस (Bocchoris, 718-712 ई. पू.) और अमेसिस (Amesis 569-525 ई. पू.) का उल्लेख किया है। लेकिन इसकी पुष्टि अन्य सूत्रों से नहीं हुई है। हजरत मूसा यहूदी विधि के मुख्य विधिकार हैं लेकिन जितनी बातें उनके नाम से चलती हैं वे सब उन्हीं की लिखी नहीं हैं। इनके अतिरिक्त अनेक मसीहा अथवा ईश्वरीय दूतों का नाम विधिकारों के रूप में लिया जा सकता है। जूडा ला नसी (Juda La nisi) द्वितीय शतब्दी मैगोनिडेस (Maimonides, 1135-1204) और जोसेफ कारो (Joseph Karo, 1488-1575) अपने समय के प्रमुख विधिकार माने जाते हैं। प्राचीन [[यूनान]] में एचियन लोक्रिस के जैल्युकस (Zaleucus 650 ई. पू.), आई ओनियन केटना के चरौंडास (Charondas 650 650 ई. पू.) की विधिकारों में गणना की जाती है। स्पार्टा के लाइकरगस (Lycurgus) प्रसिद्ध ड्राको (Darco 621 ई. पू.) और एथेंस के सौलोन (Solon, 594 ई. पू.) का प्रथम श्रेणी के विधिकारों में स्थान है। प्राचीन रोम में रोमुलस (Romulus) और नूमा (Numa) को विधिकार कहा जाता है लेकिन जब तक रोम साम्राज्य की स्थापना नहीं हो गई थी और वहाँ विधिसंहिता (condification of law) नहीं बन गई थी उस समय तक किसी को विधिकार की संज्ञा देना उचित नहीं है। थियोडोसियस द्वितीय की संहिता विधि संबंधी सामग्री का संकलन मात्र थी। सन् 527-565 ई. में जस्टीनियन की संक्षिप्त सार (digesta) और संहिता प्रकाशित हुई। उसमें विधि और न्याय संबंधी साहित्य को एकत्र किया गया। जस्टीनियन संहिता में जिन विधिशास्त्रियों की रचनाओं का संग्रह है उनमें जूलियन (Julian, द्वितीय शताब्दी), पैपिनियन (Papinian, 212 ई.) और पाल (Paul) (तीसरी शताब्दी के पूर्वार्द्ध) को विधिरचना में सहायक माना जा सकता है। [[चीन]] और [[जापान]] के प्राचीन विधिकारों के संबंध में सामग्री प्राय: अप्राप्य है।
सारांश:
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