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=== करार === जब कम से कम दो व्यक्ति किसी कार्य के करने अथवा उससे विरत रहने के सम्बन्ध में एकमत होते हैं तो उसे करार कहा जाता है। करार के लिये कम से कम दो पक्षों का होना आवश्यक है। यदि "अ" ने "ब" से प्रस्ताव किया कि "ब" "अ" का एक चित्र बना दे तो वह "ब" को इस कार्य हेतु पाँच सौ रूपए देगा। "अ" के द्वारा यह प्रस्ताव है। यदि "ब" यह स्वीकार कर ले कि पाँच सौर रूपए में वह "अ" के लिये उसका चित्र बना देगा तो यह एक ऐसा करार हुआ जो कानून द्वारा प्रवर्तनीय है और उसे प्रभावकारी बनाया जा सकता है। अर्थात् एक व्यक्ति अकेला ही कोई करार नहीं कर सकता है करार के लिये करार सम्बन्धी बातों पर उभय पक्ष की मानसिक रूप से एकमत (consensus ad idem) होना आवश्यक है। तात्पर्य यह है कि करार सम्बन्धी प्रत्येक बात के सम्बन्ध में दोनों पक्ष उसका एक ही अर्थ समझें। ऐसा न हो कि एक पक्ष एक अर्थ और दूसरा पक्ष दूसरा अर्थ समझे। "अ" के पास दो मोटर कारें हैं, एक फोर्ड और दूसरी शेवरलेट। वह अपनी फोर्ड कार पाँच हजार में बेचना चाहता है। उसने अपनी उस कार को बेचने का प्रस्ताव "ब" से किया। परंतु "ब" ने "शेवरलेट" कार समझकर उसे खरीदने की स्वीकृति प्रदान कर दी। यह करार नहीं होगा क्योंकि "अ" और "ब" में मोटरकार के सम्बन्ध में मानसिक एकात्मकता नहीं हुई। मोटरकार से "अ" ने फोर्ड मोटरकार और "ब" ने शेवरलेट कार समझी। ==== प्रस्ताव और उसके प्रकार ==== उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि प्रस्ताव ही स्वीकृति के उपरान्त करार बनता है। प्रस्ताव विभिन्न प्रकार के होते हैं परन्तु साधारणत: उनका वर्गीकरण पाँच श्रेणियों में किया गया है : 1. '''विशिष्ट प्रस्ताव''' (specific offer), जब कोई प्रस्ताव निश्चित व्यक्ति या व्यक्तियों से किया जाता है, तब उसे विशिष्ट प्रस्ताव कहते हैं। चूँकि प्रस्ताव निश्चित व्यक्ति या व्यक्तियों से किया जाता है, अत: इसमें स्वीकार करनेवाला व्यक्ति, जिसे स्वीकर्ता कहा जाएगा, निर्दिष्ट होता है। इसमें स्वीकृति की सूचना स्वीकर्ता द्वारा प्रस्तावक को देना आवश्यक है। 2. '''सामान्य प्रस्ताव''' (जनरल ऑफर) वह प्रस्ताव है जो निश्चित व्यक्ति या व्यक्तियों से नहीं किया जाता बल्कि संसार का कोई व्यक्ति इसे स्वीकार कर सकता है। इसी लिये विशिष्ट प्रस्ताव की भाँति इसमें स्वीकृति की सूचना का प्रस्तावक को दिया जाना अनिवार्य नहीं होता। प्रस्ताव में प्रकटित और इच्छित कार्य को करना ही इस प्रस्ताव की स्वीकृति मानी गई है। 3. '''स्पष्ट प्रस्ताव''' (ऐक्सप्रेस आफर) वे प्रस्ताव है जो मौखिक या लिखित रूप में हृ परन्तु स्पष्टत: हृ किए जाएँ। 4. '''सांकेतिक प्रस्ताव''' (इंप्लाइड ऑफर) ये प्रस्ताव शब्दों द्वारा न होकर कार्य द्वारा किए जाते हैं। यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान को टिकट के बदले ले जाने का प्रस्ताव, रेलगाड़ी को स्टेशन पर आना ही है। यह सामान्य प्रस्ताव का भी उदारहण है क्योंकि इसका स्वीकर्ता पूर्वनिश्चित नहीं है। 5. '''अनवरत प्रस्ताव''' (Continuous offer) इस प्रस्ताव में निश्चित दर से 5000 मन गेहूँ की आपूर्ति का प्रस्ताव। इस प्रस्ताव की स्वीकृति के उपरान्त भी एक पक्ष तुरंत ही सम्पूर्ण गेहूँ खरीदने को या दूसरा पक्ष बेचने को बाध्य नहीं किया जा सकता। ==== स्वीकृति और उसके विभिन्न प्रकार ==== प्रस्ताव की ही भाँति और उसके अनुरूप स्वीकृति की कोई विशेष विधि या प्रणाली निर्धारित करता है, वहाँ स्वीकृति का उस विधि या प्रणाली निर्धारित करता है, वहाँ स्वीकृति का उस विधि या प्रणाली द्वारा स्वीकृति न हो तो प्रस्तावक को उसी प्रणाली द्वारा स्वीकृति देने पर बल देना चाहिए। परन्तु जहाँ स्वीकृति की किसी प्रणाली या विशिष्ट विधि का उल्लेख नहीं हो, वहाँ किसी युक्तियुक्त, संगत और उचित प्रणाली द्वारा स्वीकृति दी जा सकती है। स्वीकृति भी स्पष्ट अर्थात् शब्दों द्वारा बोलकर हो सकती है अथवा सांकेतिक रूप में कार्य द्वारा। टिकट लेकर गंतव्य स्थान को जानेवाली रेलगाड़ी पर यात्री का बैठना ही कार्य द्वारा कम्पनी के प्रस्ताव की स्वीकृति है। केवल मानसिक स्वीकृति मात्र स्वीकृति नहीं समझी जा सकती। शब्दों में अथवा कार्य द्वारा उसकी अभिव्यक्ति भी आवश्यक है। प्रस्ताव में निर्दिष्ट कार्यों का करना भी कतिपय (साधारणत: उपर्युक्त सामान्य) प्रस्तावों की स्वीकृति मानी जाती है। परन्तु यह आवश्यक है कि स्वीकर्ता इस कार्य को करने के पूर्व से ही प्रस्तावक की शर्ते जानता हो। यदि स्वीकर्ता प्रस्ताव की बिना जानकारी के ही वह कार्य करता है जो प्रस्ताव में निर्दिष्ट है, तो वह प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं माना जा सकता। एक व्यक्ति गोरीदत्त ने अपने भतीजे की खोज के लिए अपने मुनीम लालमन को भेजा। लालमन के जाने के उपरान्त गौरीदत्त ने अपने भतीजे को खोज लानेवाले के लिए 501 रूपए पुरस्कार की घोषणा की। लालमन मुनीम गौरीदत्त के भतीजे को खोज लाया और पुरस्कार की माँग की। निर्णय यह हुआ कि चूँकि लालमन को लड़के की खोज के पूर्व पुरस्कार की शर्त की सूचना नहीं थी, न पुरस्कार प्राप्ति की बात ही ज्ञात थी, अत: खोए हुए लड़के को खोज लाने का लालमन का कार्य गौरीदत्त के प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं माना जा सकता (लालमन शुक्ल बनाम गौरीदत्त) प्रस्ताव से उत्पन्न लाभ को स्वीकार करना भी उपयुक्त दशाओं में प्रस्ताव की स्वीकृति समझी जाती है। वाराणसी से प्रयाग की बस में बैठकर जाना ही बस मालिक के प्रस्ताव की स्वीकृति है और स्वीकर्ता बस का किराया देने को बाध्य है। स्वीकृति प्रस्ताव के कायम रहने की दशा में होनी चाहिए। यदि प्रस्ताव निष्प्रभाव हो चुका है या प्रस्तावक द्वारा खंडित किया या वापस लिया जा चुका है तो स्वीकृति भी निरर्थक और प्रभावहीन होगी। ==== प्रस्ताव और स्वीकृति का संवहन ==== प्रस्तावक की सूचना स्वीकर्ता को और प्रस्ताव की स्वीकृति की सूचना प्रस्तावक को मिलना आवश्यक है। प्रस्ताव की सूचना जब उस व्यक्ति को प्राप्त हो जाए जिसके प्रति प्रस्ताव किया जाता है तब प्रस्ताव का संवहन या संचार पूर्ण समझा है। "क" ने अपनी घड़ी 150) में "ख" को बेचने का प्रस्ताव पत्र द्वारा "ख" की प्रेषित किया। ज्योंही "क" का पत्र "ख" को प्राप्त होगा, "क" के प्रस्ताव का संवहन पूर्ण हो जाएगा। स्वीकृर्ता के लिये पृथक् पृथक् होता है। जब स्वीकर्ता अपनी स्वीकृति प्रस्तावक के पास इस प्रकार प्रेषित कर दे कि उसका वापस लेना स्वीकर्ता के वश में न रहे, तो प्रस्तावक के विरुद्ध स्वीकृति प्रस्तावक के पास पहुँच जाए। उपर्युक्त उदाहरण में "ख" द्वारा अपनी स्वीकृति का संवहन पूर्ण समझा जाएगा परन्तु स्वीकर्ता के विरुद्ध नहीं। स्वीकर्ता के विरुद्ध स्वीकृति के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन तब पूर्ण होगा जब स्वीकति प्रस्तावक के पास पहुँच जाए। उपर्युक्त उदाहरण में "ख" द्वारा अपनी स्वीकृति का पत्र "क" के नाम डालते ही स्वीकृति की पाबंदी "क" नामक प्रस्तावक के विरुद्ध हो जाएगी परन्तु स्वीकर्ता "ख" के विरुद्ध नहीं। "ख" के विरुद्ध संवहन की पूर्णता तब होगी जब उसकी स्वीकृति का पत्र "क" को प्राप्त हो जाए। ===== डाक द्वारा सवहन का नियम और प्रस्ताव तथा स्वीकृति का खंडन ===== जब प्रस्तावक और स्वीकर्ता एक दूसरे के समक्ष उपस्थित हों तो संवहन में कोई पेचीदगी पैदा नहीं होती परन्तु जब दोनों दो स्थानों पर हों तो संवहन का माध्यम डाक : पत्र या तार : होता है। उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट है कि प्रस्ताव का पत्र प्रस्तावक द्वारा छोड़े जाते ही वह पूर्ण नहीं होता वरन् स्वीकर्ता के पास पहुँचन पर ही पूर्ण होता है। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि प्रस्तावक और स्वीकर्ता एक दूसरे के समक्ष उपस्थित हों तो संवहन में कोई पेचीदगी पैदा नहीं होती परन्तु जब तक स्वीकर्ता अपनी स्वीकृति का पत्र डाक में नहीं छोड़ देता क्योंकि तब स्वीकृति का वापस लिया जाना स्वीकर्ता के वश के बाहर हो जाता है। स्वीकर्ता द्वारा स्वीकृतिपत्र डाक में छोड़ते हर प्रस्ताव प्रस्तावक के विरुद्ध पूर्ण हो जाता है। ऊपर कहा जा चुका है कि स्वीकृति स्वीकर्ता के विरुद्ध तब पूर्ण होती है जब प्रस्तावक को प्राप्त हो जाए। प्रस्तावक को प्राप्त होने के पूर्व स्वीकर्ता अपनी स्वीकृतिपत्र डाकखाने में छोड़े जाते हो स्वीकर्ता के विरुद्ध भी पूर्ण हो जाता है। स्वीकृतापत्र देर में पहुँचने या रास्ते में खो जाने पर भी प्रभावकारी रहता है क्योंकि ऐसा माना गया है कि डाक विभाग की असावधानी या भूल का कोई प्रभाव संविदा के पक्षों पर पड़ना न्यायसंगत नहीं है। परन्तु यदि संवहन के लिये पत्र डाक में न डालकर पोस्टमैन को दे दिया जाए तो यह पर्याप्त संवहन नहीं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पत्र को लेकर डाक में छोड़ना पोस्टमैन के कर्तव्यों में सम्मिलित नहीं है।
सारांश:
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