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== मुख्य संदेश == इसके मुख्य संदेश पारम्परि्क हिन्दू रीति से अलग और कहीं-कहीं विरूद्ध भी हैं। ये इस प्रकार हैं - *ओ३म परमात्मा का निज नाम है। सत्य होने की वजह से ब्रह्म, सर्वत्र व्यापक होने की वजह से ''विष्णु'', कल्याणकारी होने से ''शिव'', सारी प्रजा के उत्पादक होने की वजह से ''गणपति'' और ''प्रजापति'', दुष्टदमन होने से ''रूद्र'' तथा [[सोम]], [[अग्नि]] इत्यादि उसी एक परमात्मा के नाम हैं। *परमात्मा को कोई रंग या स्वरूप नहीं है। ईश्वर कोई [[अवतार]], [[नबी|पैगम्बर]] या [[मसीहा]] नहीं भेजता। अपने कर्मों के कारण ही कोई आदरणीय बनता है। [[राम]] और [[कृष्ण]] आदरणीय महापुरुष थे, लेकिन इश्वरावतार नहीं। परमात्मा सर्वआनन्दमय - सच्चिदानन्द हैं। *[[देवता|देव]] का अर्थ होता है ''देने वाला (दान या कृपा)'' - अतः ऋषि, मुनि या कोई नदी जो कईयों का कल्याण करे, सूर्य, [[नक्षत्र]] आदि देव<ref>इसमें [[शतपथ ब्राह्मण]] में लिखे उस वाक्य का प्रमाण दिया जाता है, ''त्रस्तिंशत देवा... '' - जिसका अर्थ होता हैं तैतीस प्रकार के देव, यानि भला करने वाले। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, प्राण, अपान, उदान समेत दस रूद्र, आत्मा और विद्युत (इन्द्र नाम से) इनको तैेतीस प्रकार (कोटि) के देव कहा गया है। तथापि इनकी उपासना का निषेध है, उपासना सिर्फ हम सबको बनाने वाले ईश्वर की करनी चाहिए। ध्यान दीजिये कि प्रचलित समाज आत्मा को ईश्वरकृत माना जाता है, पर आर्य समाज आत्मा को ईश्वर कृति नहीं मानता है।</ref> हैं। लेकिन उपासना ईश्वर की ही करनी चाहिए जो इन सबो का कर्ता है। इसी से एकमात्र ईश्वर का ही नाम ''महादेव'' है। वेद मंत्रों को भी देव कहा गया है क्योंकि उनके आत्मसात करने से कल्याण होता है। *[[हिन्दू वर्ण व्यवस्था#वर्ण और जाति|वर्ण व्यवस्था]] गुण और कर्म को लेकर होती है - जन्म से नहीं। राजा का बेटा आवश्यक नहीं कि क्षत्रिय ही हो। ये उसके बल, पराक्रम, इन्दि्रजित और कल्याणकारी गुण पर निर्भर है। इत्यादि.. *[[मूर्तिपूजा]] वेदों (और उपनिषदों) में कहीं नहीं है। मूर्ति पूजन से लोग मूर्तिआश्रित हो जाते हैं और पुरुषार्थ के लिए प्रेरित नहीं रहते। सिर्फ पुरुषार्थ से ही जीवों का कल्याण हो सकता है। *जीव (आत्मा, पुरुष), प्रकृति और परमात्मा तीनों एक दूसरे से पृथक हैं। परमात्मा जीवों पर नियंत्रण नहीं करता - लोग अपने कार्य के लिए स्वतंत्र हैं। परिणाम अपने कार्य के अनुसार ही होगा - परमात्मा की ईच्छा के अनुसार नहीं। *मोक्ष प्राप्ति के लिए [[अष्टांग योग]], उत्तम कर्म, पवित्रता, [[यज्ञ]] (पदार्ध यज्ञ, दान, त्याग और निष्काम कर्म) सत्य का साथ और मिथ्या को दूर छोड़ना, विद्वान पुरुषों का संग, विवेक (सत्य और असत्य का विवेचन) इत्यादि कर सकते हैं। *ईश्वर उपासना करने से अपराध क्षमा नहीं करता - कई हिन्दू (और इस्लामी तथा अन्य) मतों में ईश्वर पूजन के लिए ये प्रसतुत किया जाता है पर पुस्तक के अनुसार ईश्वर सिर्फ सत्यज्ञान दे सकता है। अपराध क्षमा करना (जैसे हरि या बिसमिल्लाह बोलकर) ईश्वर जैसे न्यायकारी शक्ति के अनुकूल नहीं है। *[[वैष्णव सम्प्रदाय|वैष्णव]], [[शैव]], [[शाक्त सम्प्रदाय|शाक्त]], [[कापालिक]], [[चक्रांकित]] और [[चार्वाक दर्शन|चार्वाक]] मत वेदों को नहीं समझ सकने के कारण बने हैं। ईश्वर का कोई रूप या अवतार नहीं होता क्योंकि वेदों में इनका कहीं विवरण नहीं मिलता। *[[श्राद्ध]], तर्पण आदि कर्म जीवित श्रद्धापात्रों (माता पिता, [[पितर]], गुरु आदि) के लिए होता है, मृतकों के लिए नहीं। *[[तीर्थ]] दुख ताड़ने का नाम है - किसी सागर या नदी-सरोवर में नहाने का नहीं। इसी प्रकार आत्मा के (मोक्ष पश्चात) सुगम विचरण को स्वर्ग और पुनर्जन्म के बंधन में पड़ने को नरक कहते है - ऐसी कोई दूसरी या तीसरी दुनिया नहीं है। *इस्लाम और ईसाई धर्मों का खण्डन - कोई पैग़म्बर या मसीहा नहीं भेजा जाता है। ईश्वर को अपना सामर्थ्य जताने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वो सच्चिदानंद है। स्वर्ग, नरक, जिन्न आदि का भी खण्डन।
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