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=== साधक जीवन === ==== तंत्र साधना ==== एक दिन रात को नलिनीकांत ने देखा, उनकी शय्या के पास एक ज्योतिर्मय महापुरुष खड़े होकर कह रहे हें - "बत्स ! अपना यह मंत्र ग्रहण करो"। इतना कहकर उन्होंने नलिनीकांत को बिल्वपत्र पर लिखित एकाख्यर मंत्र प्रदान किया और उसके बाद पलभर में ही गायब हो गये। उसके बाद नलिनीकांत काफी खोज की, फिर भी कोई भी उन्हें उस मंत्र का रहस्य नहीं समझा पाया। उस समय बहुत ही निरुत्चायहित होकर नलिनीकांत ने आत्म हत्या करने का संकल्प किया और उसके बाद बह नींद में सो गये। तत्पश्यात एक बृद्ध ब्राहमण ने स्वप्न में कहा, बेटा, तुम्हारे गुरु तारापीठ के [[बामाक्षेपा]] हें। एक दिन रात को नलिनीकांत ने देखा, उनकी शय्या के पास एक ज्योतिर्मय महापुरुष खड़े होकर कह रहे हें - ''बत्स ! अपना यह मंत्र ग्रहण करो''। इतना कहकर उन्होंने नलिनीकांत को बिल्वपत्र पर लिखित एकाख्यर मंत्र प्रदान किया और उसके बाद पलभर में ही गायब हो गये। उसके बाद नलिनीकांत काफी खोज की, फिर भी कोई भी उन्हें उस मंत्र का रहस्य नहीं समझा पाया। उस समय बहुत ही नीरू उत्चाया निरुत्चायहित होकर नलिनीकांत ने आत्म हत्या करने का संकल्प किया और उसके बाद बह नींद में सो गये। तत्पश्यात एक बृद्ध ब्राहमण ने स्वप्न में कहा, ''बेटा, तुम्हारे गुरु तारापीठ के बामाखेपा हें''। नलिनीकांत [[बीरभूम जिला|बीरभूम जिले]] के [[तारापीठ]] में साधू बामाक्षेपा के पास पहुंचे।<ref name="Ray1965">{{cite book|author=Benoy Gopal Ray|title=Religious movements in modern Bengal|url=http://books.google.com/books?id=btYXAAAAIAAJ|accessdate=26 नवम्बर 2011|series=''(नलिनीकांत साधू बामाक्षेपा के पास पहुंचे)''|year=1965|publisher=Visva-Bharati|page=100}}</ref> सिद्ध महात्मा [[बामाक्षेपा]] ने उन्हें मंत्र की साधन प्रणाली सिखाने का बचन दिया। उनकी कृपा से नलिनीकांत ने देबी तारा को सुधांसूबाला की मूर्ति में दर्शन किया और देवी के साथ बर्तालाप किया। देवी के बार बार दर्शन पाकर भी नलिनीकांत उन्हें स्पर्श करने में असमर्थ रहे। इसका तत्व जानने के लिए बह तंत्रिक्गुरु [[बामाक्षेपा]] के उपदेशानुसार संन्यासी गुरु के खोज करने लगे। ==== ज्ञान साधना ==== गुरु की खोज करते करते उन्होंने [[भारत]] के अनेक स्थानों का भ्रमण किया और अंत में [[पुष्कर]] [[तीर्थ]] में स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती के दर्शन पाकर बह उनके चरनाश्रित हुए |<ref name="Ray1965">{{cite book|author=Benoy Gopal Ray|title=Religious movements in modern Bengal|url=http://books.google.com/books?id=btYXAAAAIAAJ|accessdate=26 नवम्बर 2011|series=''(सन्यासी गुरु के खोज)''|year=1965|publisher=Visva-Bharati|page=101}}</ref> सच्चिदानंद के दर्शन करते ही नलिनीकांत जान पाये की जिन [[महात्मा]] ने उन्हें स्वप्न में मंत्र दान किया था, बे ही यही सच्चिदानंद स्वामी है। नलिनीकांत गुरु के पास रहकर उनके आदेश से अनेक श्रमसाध्य कार्य किये। उनकी सेवा से संतुस्ट होकर गुरुदेव ने उन्हें सन्यास की दिक्ष्या दे कर उनका नाम '''निगमानंद''' रखा। ==== योग साधना ==== सन्यास लेने के बाद तत्व की उपलब्धि के लिए उन्होंने गुरु के आदेश पर चारधामों का भम्रण किया।<ref>[http://orissa.gov.in/e-magazine/Orissareview/june2006/engpdf/13.pdf Swami Nigamananda's visit to Char Dham ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20111003235611/http://orissa.gov.in/e-magazine/Orissareview/june2006/engpdf/13.pdf |date=3 अक्तूबर 2011 }} ''Swami Nigamananda was instructed by his guru Swami Sachidananda to visit all these spiritual centers (dhamas) to realize the deeper significance of the four great sayings of Vedas and Upanishads.'' '''Page: 1 (Para - 2nd)'''</ref> परन्तु जिस तत्व की उन्होंने उपलब्धि की, उस तत्व की अंतर में उपलब्धि के लिये बे ज्ञानी गुरु के आदेश से उनसे विदा ले कर योगी गुरु की खोज में निकल पड़े। योगी गुरु की खोज के समय, एक दिन बनों के रमणीय दृश्य को देखकर बह इतने मोहित ओ गये कि दिन ढल जाने कि बाद भी उन्हें पता ही नहीं चल पाया कि शाम हो चुकी है। फलतः उन्हाने बस्ती में न लौटकर एक पेड़ के कोटर में रात बिताई | रात बीत जाने का बाद परिब्राजक निगमानंद ने पेड़ के नीचे एक दीर्घकाय तेजस्बी साधू के दर्शन किये और उनके इशारे पर उनका अनुसरण किया। बाद में उस साधुने निगमानंद को अपना परिचय दिया और उन्हें योग शिख्या देने का बचन देकर उन्हें अपनी [[कुटिया]] में ठहराया। उस साधू के [[आश्रम]] में रहकर स्वामी निगमानंद ने योगसाधन के कौशल सीखे और उनके आदेश से बह योग साधना के लिय लोकालय में लौटे। उनके उन योग शिख्यादाता गुरु का नाम '''उदासिनाचार्य सुमेरुदास महाराज''' है।<ref name="Ray1965">{{cite book|author=Benoy Gopal Ray|title=Religious movements in modern Bengal|url=http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ|accessdate=26 दिसम्बर 2011|series=''He found a Yogi guru called "Sumerudasji" (सुमेरु दास)otherwise known as "Koot Hoomi Lal Singh" (कूथ हुमि लाल सिंह)''|year=1965|publisher=Visva-Bharati|page=101|archive-url=https://web.archive.org/web/20130623063511/http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ|archive-date=23 जून 2013|url-status=live}}</ref><ref name="Behera1998">{{cite book|author=M. C. Behera|title=Pilgrim centre Parashuram Kund: articulation of Indian society, culture, and economic dimension|url=http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ|accessdate=2 मई 2012|series='''Swami Nigamananda'''|date=1 जनवरी 1998|publisher=Commonwealth Publishers|isbn=978-81-7169-503-4|pages=19, 41|archive-url=https://web.archive.org/web/20130623070510/http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ|archive-date=23 जून 2013|url-status=live}}</ref> ;निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति निगमानंद हठ योग की साधना के लिए पावना जिला के हरिपुर गांव में रहने लगे। साधना में अनेक बिघ्न पैदा होने के कारण निगमानंद कामाख्या चलें गये और पहेले सविकल्प समाधि प्राप्त की। उसके बाद [[कामाख्या मन्दिर|कामाख्या]] पहाड़ में निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। ऐसा माना जाता हे, निगमानंद निर्विकल्प समाधि में निमग्न होकर '''में गुरु हूँ''' - यह स्वरुप-ज्ञान लेकर पुनः बापस आये थे। लेखक [[:en:Durga Charan Mohanty|दुर्गा चरण महान्ति]] ने लिखा "में कौन हूँ" यह जानने केलिए स्वामी निगमानंद संसार को त्याग कर बैरागी बने थे और "में गुरु हूँ", यह भाव लेकर वह संसार में लौट आये। ==== भाव साधना ==== पूर्णज्ञानी, यह अभिमान ले कर निगमानंद [[काशी]] में पहुंचे। बहां पर माँ ''अर्णपुर्न्ना'' (काशी नगरी की इष्ट देवी) ने उनके भीतर अपूर्णता-बोध का जागरण कर दिया और कहा, '' तुमने ब्रहमज्ञान प्राप्त किया हे सही, परन्तु अबर ब्रहमज्ञान, या [[प्यार|प्रेम-भक्ति]] के पथ में जो भगबत [[ज्ञान]] है, तुम्हें प्राप्ति नहीं हुई। इसलिए तुम पूर्ण नहीं हो ''। तत्पचात श्री निगमानंद देव प्रेम शिद्धा ''गौरीदेवी'' की कृपा से अबर ब्रहम ज्ञान प्राप्त कर चरम सिद्धि में पहुंचे। प्रेम सिद्धि के बाद स्वामी निगमानंद देव की इष्ट देवी ''तारा'' उन्हें प्रतख्य दर्शन देकर कहा ''तुम्ही सार्वभौम गुरु हो; जगत बासी तुम्हारी संतान है। तुम लोकलय में जाकर अपने [[शिष्य]] भक्त को स्वरुप ज्ञान दो''। ''तारादेवी'' के बाक्य से निगमानंद ने अपने को पूर्ण समझा।
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