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== अनुवाद के सिद्धान्त == अनुवाद सिद्धान्त कोई अपने में स्वतन्त्र, स्वनिष्ठ, सिद्धान्त नहीं है और न ही यह उस अर्थ में कोई ‘विज्ञान' ही है, जिस अर्थ में [[गणितशास्त्र]], [[भाषाविज्ञान|भाषाशास्त्र]], [[समाजशास्त्र]] आदि हैं। इसकी ऐसी कोई विशिष्ट अध्ययन सामग्री तथा अध्ययन प्रणाली भी नहीं, जो अन्य शास्त्रों की अध्ययन सामग्री तथा प्रणाली से इस रूप में भिन्न हो कि, इसका मूलतः स्वतन्त्र व्यक्तित्व बन सके। वस्तुतः, यह अनुवाद के विभिन्न मुद्दों से सम्बन्धित ज्ञानात्मक सूचनाओं का एक निकाय है, जिससे अनुवाद को एक प्रक्रिया (अनुवाद कार्य), एक निष्पत्ति (अनुदित पाठ), तथा एक सम्बन्ध (सममूल्यता) के रूप में समझने में सहायता मिलती है। इसके लिए सद्यः 'अनुवाद विद्या (ट्रांसलेशन स्टडीज), 'अनुवाद विज्ञान' (साइंस ऑफ ट्रांसलेशन), और 'अनुवादिकी' (ट्रांसलेटालजी) शब्द भी प्रचलित हैं। अनुवाद, भाषाप्रयोग सम्बन्धी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसकी एक सुनिश्चित परिणति होती है तथा जिसके फलस्वरूप मूल एवं निष्पत्ति में 'मूल्य' की दृष्टि से समानता का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार प्रक्रिया, निष्पत्ति, और सम्बन्ध की सङ्घटित इकाई के रूप में अनुवाद सम्बन्धी सामान्य प्रकृति की जानकारी ही अनुवाद सिद्धान्त है, जो मूलतः एकान्वित न होते हुए भी सङ्ग्रहणीय, रोचक, ज्ञानवर्धक, तथा एक सीमा तक वास्तविक अनुवाद कार्य के लिए उपादेय है। अपने विकास की वर्तमान अवस्था में यह बहु-विद्यापरक अनुशासन बन गया है। जिसका ज्ञान प्राप्त करना स्वयमेव एक लक्ष्य है तथा जो जिज्ञासु पाठक के लिए बौद्धिक सन्तोष का स्रोत है। अनुवाद सिद्धान्त की अनुवाद कार्य में उपयोगिता का आकलन के समय इस सामयिक तथ्य को ध्यान में रखा जाता है कि वर्तमान काल में अनुवाद एक सङ्गठित व्यवसाय हो गया है, जिसमें व्यक्तिगत रुचि की अपेक्षा व्यावसायिक-सामाजिक आवश्यकता से प्रेरित प्रशिक्षणार्थियों की सङ्ख्या अधिक होती है । विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए तथा सामान्य रूप से रुचिशील अनुवादकों के लिए अनुवाद कार्य में दक्षता विकसित करने में अनुवाद सिद्धान्त के योगदान को निरूपित किया जाता है । इस योगदान का सैद्धान्तिक औचित्य इस दृष्टि से भी है कि अनुवाद कार्य सर्जनात्मक होने के कारण ही गौण रूप से समीक्षात्मक भी होता है । इसे 'सर्जनात्मक-समीक्षात्मक' भी कहा जाता है । सर्जनात्मकता को विशुद्ध तथा पुष्ट करने के लिए जो समीक्षात्मक स्फुरणाएँ अनुवादक में होती हैं, वे अनुवाद सिद्धान्त के ज्ञान से प्ररित होती हैं । अनुवाद की विशुद्धता की निष्पत्ति में सिद्धान्त ज्ञान का योगदान रहता है । साथ ही, अनुवाद प्रक्रिया की जानकारी उसे पर्याय-चयन में अधिक सावधानी से काम करने में सहायता कर सकती है । इससे अधिक महत्त्वपर्ण बात मानी जाती है कि वह मूर्खतापूर्ण त्रुटियाँ करने से बच सकता है । मूलपाठ का भाषिक, विषयवस्तुगत, तथा सांस्कृतिक महत्त्व का कोई अंश अनूदित होने से न रह जाए, इसके लिए अपेक्षित सतर्क दृष्टि को विकसित करने में भी अनुवाद सिद्धान्त का ज्ञान अनुवादक की सहायता करता है । इसी प्रश्न को दूसरे छोर से भी देखा जाता है । कहा जाता है कि जो लोग मौलिक लिख सकते हैं, वे लिखते हैं, जो लिख नहीं पाते वे अनुवाद करते हैं, और जो लोग अनुवाद नहीं कर सकते, वे अनुवाद के बारे में चर्चा किया करते हैं । वस्तुतः इन तीनों में परिपूरकता है - ये तीनों कुछ भिन्न-भिन्न हैं – तथापि यह माना जाता है कि अनुवाद विषयक चर्चा को अधिक प्रामाणिक तथा विशद बनाने में अनुवाद सिद्धान्त के विद्यार्थी को अनुवाद कार्य सम्बन्धी अनुभव सहायक होता है । यह बात कुछ ऐसा ही है कि सर्जनात्मकता से अनुभव के स्तर पर परिचित साहित्य समीक्षक अपनी समीक्षात्मक प्रतिक्रियाओं को अधिक विश्वासोत्पादक रीति से प्रस्तुत कर सकता है।
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