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== भ्रूण और शिशु == [[Image:Chicken Egg without Eggshell 5859.jpg|thumb|200px| बाहरी आवरण खोल उतरा हुआ एक मुर्गी का अण्डा।]] पक्षियों के अंडे बाहर दिए जाते हैं और भ्रूण का विकास बाहर हो अंडे के अंदर होता है। भ्रूण के पूर्ण विकसित हो जाने पर विहंग शिशु अंडे रूपी कैदखाने से बाहर आने के लिए अपनी चोंच से बार बार प्रहार करता है और अंडे के बीचों बीच, अथवा अन्य किसी चौड़े स्थल पर जातिभेद के अनुसार, एक दरार हो जाती है और शिशु बाहर निकल आता है। उस समय वह एक तरल पदार्थ से भीगा हुआ सा रहता है, जो हवा लगने से शीघ्र ही सूख जाता है। मुर्गी, तीतर, शुतुरमुर्ग आदि के बच्चे तो निकलते ही दौड़ना शुरु कर देते हैं, पर तोते, फाख्ते और कौए आदि के शिशु कई दिनों तक आँख नहीं खोल पाते,। वे एक निरीह सी अवस्था में पड़े रहते है तथा हफ्तों तक धोंसले में ही अपने शैशव के दिन बिताते हैं। अंडे से बाहर आने पर शिशु चिड़िया के प्रथम कुछ सप्ताह कुछ विशेष कठिनाइयों एवं खतरों के होते हैं। इन दिनों वह न केवल छोटी और कमजोर होती हैं, बल्कि प्राय: स्वयं भोजन चुगने में असमर्थ तथा उड़ने से भी लाचार होती है। भिन्न जाति के पक्षियों के शिशु भिन्न अवस्था में उत्पन्न होते हैं और इस आधार पर उनका वर्गीकरण निम्नलिखित दो प्रमुख श्रेणियों में किया जा सकता है : * वे शिशु जो उत्पन्न होने के साथ ही घोंसला छोड़ देते और इधर उधर दौड़ने लगते हैं, नीड़त्यागी (nidifugous या nestquitting) कहलाते हैं और * उन शिशुओं को, जो उत्पन्न होने के पश्चात् नीड़ में ही पड़े रहते हैं, नीड़वासी (nidicolous) कहते हैं। कभी कभी नीड़त्यागी के लिए चूजा (click) शब्द का प्रयोग और नीड़वासी के लिए नीड़स्थ (nestlings) का प्रयोग किया जाता है। नीड़त्यागी शिशु की आँखें जन्म से ही खुली होती हैं और इनका शरीर मुलायम परों से ढका होता है। ये आरंभ से ही सतर्क तथा चंचल होते हैं और दौड़ या तैर सकते हैं। हाँ, यदि इन्हें छेड़ा न जाय तो जन्म के पश्चात् कुछ घंटों तक ये शांत पड़े रहना पसंद करेंगे। ये प्रारंभ से ही अपना दाना स्वयं चुगना शुरु कर देते हैं। बतख और मुर्गी के शिशु इसके अच्छे उदाहरण है। जंगली चिड़ियों में टिट्टिभ, जलकुक्कुटी (rail), बतख और शिकार की अन्य चिड़ियों के शिशु भी ऐसा ही करते हैं। शिकार की चिडियों में एक और विशेषता यह होती है कि ये शीघ्र ही उड़ने भी लगती हैं। नीड़वासी शिशु जन्म के पश्चात् बड़े होने तक घोंसले में ही पड़े रहते हैं और इन्हें आहार के लिए अपने माँ बाप पर ही पूर्णत: निर्भर रहना पड़ता हैं। ये जन्म के समय अंधे और असहाय होते हैं तथा अधिकांश अवस्थाओं में कम या अधिक नंगे; अर्थात् परहीन एवं अनाकर्षक होते हैं। बताखी, किलकिला (Kingfisher); और हरित काष्ठकूट (green woodpecker) के शिशु बिलकुल नंगे उत्पन्न होते हैं। जलकाग तथा बक ऐसे पक्षियों का समूह है जिनके बच्चे जन्मकाल में बिलकुल नंगे होते हैं, अर्थात् उनके शरीर पर बहुत कम पर रहते हैं। पक्षी जिस तत्परता के साथ अंडे सेते हैं, उसी तत्परता से अपनी संतान का पालन पोषण एवं रक्षण भी करते हैं। संतानरक्षा में बहुधा देखा गया है कि पक्षी अपने प्राण की भी चिंता नहीं करते। संतानरक्षा में तरह-तरह की बहानेबाजियाँ करके ये पक्षी आगंतुक को अचंभे में भी डाले देते हैं। बहुधा ये उसे देखकर इस प्रकार लँगड़ाने लगते हैं, मानो किसी शिकारी द्वारा घायल कर दिए गए हों। दुश्मन शिकारी, बधिक, श्वान, शृगालादि इन्हें पकड़ने की आशा लेकर जब इनका पीछा करते हैं, तो ये दूर तक चकमा देते हुए निकल जाते हैं और तब एकाएक तेजी से उड़कर कहीं चल देते हैं। इस तरह दुश्मन को घोंसले से दूर ले जाकर उसे पथभ्रष्ट कर देते हैं, जिससे वह किसी और दिशा में चल दे तथा नीड़ के शिशुओं पर आई विपदा इस तरह टल जाए। चिड़ियाँ दूसरों की आँख में धूल झोंकना भी खूब जानती हैं। जब वे कभी घिर जाती हैं तो मृतत् होकर जमीन पर लेट रहती हैं, जिसे देखनेवाला उन्हें मृत समझकर आगे की ओर बढ़ जाता है। फिर ये शीघ्र जमीन छोड़कर आगे भाग खड़ी होती है। कभी-कभी पकड़ी जाने पर भी ये मृतक होने का स्वाँग भरती हैं, ताकि हम इन्हें मृत समझकर छोड़ दे।
सारांश:
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