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=== पूर्व मध्यकाल (750-1050) === 10. पेपीन के पुत्र चार्लमेन (Charlemagne) ने अपने दीर्घ राज्यकाल (768-814 ई.) में यूरोप की राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक एकता के लिये सफल प्रयास किया। उन्होंने स्पेन में इस्लाम का विरोध किया तथा उत्तर में सैक्सन (Saxon) जातियों को हराकर उनको ईसाई बनने के लिये बाध्य किया। उनके जीवनकाल में सर्वत्र शिक्षा का प्रचार तथा धार्मिक उन्नति हुई। किंतु उनकी मृत्यु के बाद उनके साम्राज्य का विघटन हुआ और समस्त यूरोप में अशांति फैल गई। इसका कुप्रभाव चर्च के संगठन पर भी पड़ा। उस युग को पश्चिम के अध्यात्मिक पतन का युग कहा गया है। साधारण पुरोहितों में अनुशासनहीनता बढ़ गई और उसमें से बहुतों ने विवाह किया यद्यपि पाँचवीं शताब्दी से पुरोहितों के अविवाहित रहने का नियम चला आ रहा था। बिशप तथा मठाध्यक्ष सामंत भी थे और उनके चुनाव में बहुधा घूसखोरी का हाथ रहा करता था। पोप अब राजा भी थे तथा पेपल स्टेट्स के शासन के लिये बहुत से पुरोहित राजनीतिक मात्र ही रह गए थे। पोपों के चुनाव में रोमन सामंतों की प्रतियोगिता भी होने लगी तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा बहुत से पोपों की हत्या भी कर दी गई थी। इस कारण 886 ई. से 1043 ई. तक 37 पोप हो गए। उस पतन के प्रतिक्रियास्वरूप 10वीं शताब्दी में फ्रांस के क्लुनी (Cluny) मठ नेतृत्व में पश्चिम यूरोप में मठवासी जीवन का अपूर्व पुनर्विकास हुआ। सैकड़ों दूसरे उपमठ क्लुनी के मठाध्यक्ष का अनुशासन स्वीकार करते थे जिससे पोप के बाद क्लुनी का मठाध्यक्ष उस समय ईसाई संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया था। 11. कुंस्तुंतुनिया के नेतृत्व में नवीं शताब्दी में [[बालकन]] की [[स्लाव लोग|स्लाव]] (Slav) जातियों का धर्मपरिवर्तन हुआ और उसके बाद [[रूस]] में भी ईसाई धर्म का विशेष विस्तार हुआ। ईसाई धर्म का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यूनानी भाषा बोलनेवाले प्राच्य काथोलिकों तथा लैटिन भाषा बोलनेवाले पाश्चात्य कॉथोलिकों का अलगाव उस युग में बढ़ने लगा। उसके कई कारण हैं। यूनानी संस्कृति लैटिन संस्कृति से कहीं अधिक परिष्कृत थी। एक ओर प्राच्य चर्च तथा बीजैंटाइन (Byzantine) साम्राज्य का एकीकरण हुआ था और दूसरी ओर पश्चिम में रहनेवाले पोप को वहाँ के शासकों से सहायता मिला करती थी। राजधानी कुंस्तुंतुनिया के बिशप को पेत्रिआर्क की उपाधि मिली थी और उनका महत्व इतना बढ़ गया कि वह समस्त प्राच्य चर्च के अध्यक्ष माने जाते थे। इन सब कारणों से पूर्व में रोम के पोप के अधिकार की उपेक्षा होने लगी। नवीं शताब्दी में फोतियस (Photius) ने कुछ समय तक प्राच्य चर्चों को रोम से अलगकर दिया था और अपनी रचनाओं में रोम के विरुद्ध इतना कटु प्रचार किया था कि, यद्यपि उसने बाद में रोम का अधिकार पुन: स्वीकार कर लिया, फिर भी उसकी रचनाओं का कुप्रभाव नहीं मिट सका और बाद में पेत्रिआर्क माइकल सेरुलारियस के समय में कुंस्तुंतुनिया का चर्च रोम से अलग हो गया (1054 ई.)। [[इस्लाम]] ने [[काथॉलिक चर्च]] को [[यूरोप]] तक सीमित कर दिया था, अब वह पश्चिम यूरोप तक ही सीमित रहा।
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