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== महत्वपूर्ण कार्य == आधुनिक हिंदी साहित्य में मिश्र जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मिश्र जी बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविताऔर निबंध आदि में उनकी देन अपूर्व है। उन्होंने हिंदी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। भाव, भाषा और शैली में नवीनता तथा मौलिकता का समावेश करके उन्हें आधुनिक काल के अनुरूप बनाया। मिश्र जी का जीवन निरंतर संघर्ष करने वाले एक साहित्यिक योद्धा का जीवन था। [[१८८३]] में पिता के देहावसान के बाद इन्हें अनेक बिपत्तियों का सामना करना पड़ा था। आजीविका के रूप में वैद्यक को अपना लेने के बाद भी ये साहित्य से विमुख नहीं हुये। इन्होने [[हिन्दी]] और [[खड़ी बोली]] के प्रचार-प्रसार के लिए अपना सारा जीवन लगा दिया। [[हिन्दी]] और [[संस्कृत]] के अतिरिक्त [[उर्दू]] और [[बंगाली]] में भी इनकी अच्छी गति थी और [[ज्योतिष]],[[व्याकरण]],[[साहित्य]] और [[आयुर्वेद]] के ये धुरंधर विद्वान थे।<ref>हिन्दी विश्वकोश, खंड:९, पृष्ठ :२८३</ref> [[समाज]] सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले पण्डित जी ने [[चंपारण]] के अतिरिक्त [[गोरखपुर]],[[बस्ती, उत्तर प्रदेश|बस्ती]],[[अयोध्या]],[[काशी]],[[प्रयाग]] जैसे नगरों में [[भाषा]],[[साहित्य]] और [[धर्म]] के प्रचार और संबर्द्धन के लिए ''विद्या धर्म वर्धनी सभा'' की स्थापना की। कहा जाता है कि इन नगरों में स्थापित सभाओं के सुचारु संचालन के लिए इन्हें भारतेन्दु जी के अतिरिक्त मझौले के राजा खड्ग बहादुर मल्ल और पण्डित उमापति शर्मा से आर्थिक सहयोग प्राप्त होता था।<ref>हिन्दी विश्व कोश, खंड:९, पृष्ठ :२८३</ref> उल्लेखनीय है कि 1923 ई में पटना में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पंचम अधिवेशन की अध्यक्षता में मिश्र ने की थी। 1889 में विद्या धर्मविर्द्धनी सभा द्वारा विद्या धर्मदीपिका नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन मझगांवा बरही, जिला गोरखपुर से आरंभ हुआ तो इस पत्रिका के संपादक पं॰ चन्द्रशेखर धर मिश्र हुए और मझगांवा निवासी पंडित यमुनाप्रसाद शुक्ल इसके कार्यकारी सम्पादक बने। एक वर्ष बाद विद्याधर्म दीपिका का प्रकाशन रामनगर पश्चिमी चम्पारण से होने लगा। रामनगर से बिद्याधर्म दीपिका के प्रकाशन में रामनगर के राजा प्रिंस मोहन विक्रम साह और राज के मैनेजर एवं साहित्यकार पं॰ देवी प्रसाद उपाध्याय का महत्वपूर्ण योगदान था। साहित्य समीक्षकों का मानना है कि विद्या धर्म दीपिका भारतेन्दु युग की प्रतिनिधि पत्रिका थी। पं॰ चन्द्रशेखर मिश्र ने चम्पारण चन्द्रिका नामक पत्रिका का भी संपादन किया।
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