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== उत्सव का स्वरूप == छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत [[कार्तिक शुक्ल चतुर्थी]] को तथा समाप्ति [[कार्तिक शुक्ल सप्तमी]] को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। === नहाय खाय === छठ पर्व का पहला दिन जिसे ‘नहाय-खाय’ के नाम से जाना जाता है,उसकी शुरुआत चैत्र या कार्तिक महीने के चतुर्थी [[कार्तिक शुक्ल चतुर्थी]] से होता है ।सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर स्नान करते है। व्रती इस दिन नाखनू वगैरह को अच्छी तरह काटकर, स्वच्छ जल से अच्छी तरह बालों को धोते हुए स्नान करते हैं। लौटते समय वो अपने साथ गंगाजल लेकर आते है जिसका उपयोग वे खाना बनाने में करते है । वे अपने घर के आस पास को साफ सुथरा रखते है । व्रती इस दिन सिर्फ एक बार ही खाना खाते है । खाना में व्रती कद्दू की सब्जी ,मुंग चना [[दाल]], [[चावल]] का उपयोग करते है .तली हुई पूरियाँ पराठे सब्जियाँ आदि वर्जित हैं. यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए आम की लकड़ी और मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है। जब खाना बन जाता है तो सर्वप्रथम व्रती खाना खाते है उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य खाना खाते है । <ref>{{Cite web|url=http://chhathparv.com/chhath-first-day-nahay-khaye |title=छठ पूजा पहला दिन-नहाय खाएा|website=Chhath Parv|access-date=22 अक्तूबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022031305/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-first-day-nahay-khay.html|archive-date=22 अक्तूबर 2019|url-status=dead}}</ref> === खरना और लोहंडा === छठ पर्व का दूसरा दिन जिसे खरना या लोहंडा के नाम से जाना जाता है,[[चैत्र]] या [[कार्तिक]] महीने के पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखते है . इस दिन व्रती अन्न तो दूर की बात है सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है। खाना बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त' करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं। परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं ताकी कोई शोर न हो सके। एकान्त से खाते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है। पुन: व्रती खाकर अपने सभी परिवार जनों एवं मित्रों-रिश्तेदारों को वही ‘खीर-रोटी' का प्रसाद खिलाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को 'खरना' कहते हैं। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है। इसके बाद अगले 36 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते है। मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद [[ठेकुआ]] बनाती है । <ref>{{Cite web|url=https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-fourth-day-usha-arghya.html|title=छठ पूजा का दूसरा दिन - खरना|website=Chhath Parv|access-date=22 अक्तूबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022155622/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-fourth-day-usha-arghya.html|archive-date=22 अक्तूबर 2019|url-status=dead}}</ref> === संध्या अर्घ्य === [[चित्र:Chhath puja photo.jpg|right|thumb|छठ पर्व करते छठव्रती]] छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है,चैत्र या [[कार्तिक शुक्ल षष्ठी]] को मनाया जाता है। पुरे दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है। छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद जैसे'''ठेकुआ''',<ref>{{Cite web|url=https://food.ndtv.com/food-drinks/chhath-2017-5-things-you-must-know-about-thekua-a-popular-chhath-recipe-1766423|title=Chhath 2017: 5 Things You Must Know About Thekua- A popular Chhath Recipe|website=NDTV Food|accessdate=14 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190514045040/https://food.ndtv.com/food-drinks/chhath-2017-5-things-you-must-know-about-thekua-a-popular-chhath-recipe-1766423|archive-date=14 मई 2019|url-status=live}}</ref> चावल के लड्डू जिसे कचवनिया भी कहा जाता है, बनाया जाता है । छठ पूजा के लिए एक बांस की बनी हुयी टोकरी जिसे दउरा कहते है में पूजा के प्रसाद,फल डालकर देवकारी में रख दिया जाता है। वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल,और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है। छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बना रहता है उस पर पूजा का सारा सामान रखकर नारियल चढाते है और दीप जलाते है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है। सामग्रियों में, व्रतियों द्वारा स्वनिर्मित गेहूं के आटे से निर्मित 'ठेकुआ' सम्मिलित होते हैं। यह ठेकुआ इसलिए कहलाता है क्योंकि इसे काठ के एक विशेष प्रकार के डिजाइनदार फर्म पर आटे की लुगधी को ठोकर बनाया जाता है। उपरोक्त पकवान के अतिरिक्त कार्तिक मास में खेतों में उपजे सभी नए कन्द-मूल, फलसब्जी, मसाले व अन्नादि यथा गन्ना, ओल, हल्दी, नारियल, नींबू(बड़ा), पके केले आदि चढ़ाए जाते हैं। ये सभी वस्तुएं साबूत (बिना कटे टूटे) ही अर्पित होते हैं। इसके अतिरिक्त दीप जलाने हेतु,नए दीपक,नई बत्तियाँ व घी ले जाकर घाट पर दीपक जलाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण अन्न जो है वह है कुसही केराव के दानें (हल्का हरा काला, मटर से थोड़ा छोटा दाना) हैं जो टोकरे में लाए तो जाते हैं पर सांध्य अर्घ्य में सूरजदेव को अर्पित नहीं किए जाते। इन्हें टोकरे में कल सुबह उगते सूर्य को अर्पण करने हेतु सुरक्षित रख दिया जाता है। बहुत सारे लोग घाट पर रात भर ठहरते है वही कुछ लोग छठ का गीत गाते हुए सारा सामान लेकर घर आ जाते है और उसे देवकरी में रख देते है । <ref>{{Cite web|url=https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-third-day.html|title=छठ पूजा का तीसरा दिन - संध्या अर्घ्या|website=Chhath Parv|access-date=22 अक्तूबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022135330/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-third-day.html|archive-date=22 अक्तूबर 2019|url-status=dead}}</ref> === उषा अर्घ्य === [[चित्र:सूर्यदेव को अर्घ्य देते छठव्रती .jpg|अंगूठाकार|212x212पिक्सेल|सूर्यदेव को अर्घ्य देते छठव्रती ]] चौथे दिन [[कार्तिक शुक्ल सप्तमी]] की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html|title=छठ पूजा का चौथा दिन - उषा अर्घ्या|website=Chhath Parv|access-date=22 अक्तूबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022034042/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html|archive-date=22 अक्तूबर 2019|url-status=dead}}</ref>
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