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===आचार विचार=== जैन पन्थ में [[आत्मशुद्धि]] पर बल दिया गया है। आत्मशुद्धि प्राप्त करने के लिये जैन पन्थ में देह-दमन और कष्टसहिष्णुता को मुख्य माना गया है। निर्ग्रंथ और निष्परिग्रही होने के कारण तपस्वी महावीर नग्न अवस्था में विचरण किया करते थे। यह बाह्य तप भी अन्तरंग शुद्धि के लिये ही किया जाता था। प्राचीन जैन सूत्रों में कहा गया है कि भले ही कोई नग्न अवस्था में रहे या एक एक महीने [[उपवास]] करे, किन्तु यदि उसके मन में [[माया]] है तो उसे सिद्धि मिलने वाली नहीं। जैन आचार-विचार के पालन करने को 'शूरों का मार्ग' कहा गया है। जैसे लोहे के चने चबाना, बालू का ग्रास भक्षण करना, समुद्र को भुजाओं से पार करना और तलवार की धार पर चलना दुस्साध्य है, वैसे ही निर्ग्रंथ प्रवचन के आचरण को भी दुस्साध्य कहा गया है। [[बौद्ध]] पन्थ की भाँति जैन पन्थ में भी [[जाति]] भेद को स्वीकार नहीं किया गया। प्राचीन जैन ग्रन्थों में कहा गया है कि सच्चा [[ब्राह्मण]] वही है जिसने राग, द्वेष और भय पर विजय प्राप्त की है और जो अपनी [[इन्द्रिय|इन्द्रियों]] पर निग्रह रखता है। जैन धर्म में अपने अपने कर्मों के अनुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और [[शूद्र|शुद्र]] की कल्पना की गई है, किसी जाति विशेष में उत्पन्न होने से नहीं। महावीर ने अनेक म्लेच्छ, चोर, डाकू, मछुए, वेश्या और चांडालपुत्रों को जैन धर्म में दीक्षित किया था। इस प्रकार के अनेक कथानक जैन ग्रन्थों में पाए जाते हैं। जैन पन्थ के सभी तीर्थकर [[क्षत्रिय]] कुल में हुए थे। इससे मालूम होता है कि पूर्वकाल में जैन धर्म क्षत्रियों का धर्म था, लेकिन आजकल अधिकांश [[वैश्य]] लोग ही इसके अनुयायी हैं। वैसे दक्षिण भारत में [[सेतवाल]] आदि कितने ही जैन खेतीबारी का धंधा करते हैं। पंचमों में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों के धंधे करनेवाले लोग पाए जाते हैं। [[जिनसेन मठ]] ([[कोल्हापुर]]) के अनुयायियों को छोड़कर और किसी मठ के अनुयायी चतुर्थ नहीं कहे जाते। चतुर्थ लोग साधारणतया खेती और जमींदारी करते हैं। [[सातारा|सतारा]] और [[बीजापुर]] जिलों में कितने ही जैन धर्म के अनुयायी जुलाहे, छिपी, दर्जी, सुनार और कसेरे आदि का पेशा करते हैं।
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