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==अंग== [[चित्र:Tabla y duggi1.JPG|अंगूठाकार|तबला और डुग्गी]] "तबला" के दो अंग होते हैं, अर्थात इसमें दो [[ड्रम]] होते हैं जिनका आकार और आकृति एक दूसरे से कुछ भिन्नता लिए होती है।<ref name=brittabla/><ref name="Chatterjee2006">{{cite book|author=समीर चटर्जी|title=A study of tabla: a comprehensive study with history, theory, and compositions accompanied by an instructional DVD|url=https://books.google.com/books?id=Q_nZAAAAMAAJ|year=2006|publisher=छंदायन|page=21|access-date=26 फ़रवरी 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20170227072321/https://books.google.com/books?id=Q_nZAAAAMAAJ|archive-date=27 फ़रवरी 2017|url-status=live}}</ref><ref>{{cite book|author=विलियम एल्विस |title=म्यूजिक ऑफ़ दि पीपल्स ऑफ़ दी वल्ड |url=https://books.google.com/books?id=688hCQAAQBAJ&pg=PA252|year=2013|publisher=Cengage Learning|isbn=1-133-30794-9|page=252}}</ref> तकनीकी तौर पर, एक सीधे हाथ वाले वादक द्वारा, दाहिने हाथ (कुशल हाथ) से बजाय जाने वाला अंग ही '''''तबला''''' कहलाता है। आम भाषा में इसे दायाँ या दाहिना कहते हैं। यह लगभग 15 सेंटीमीटर (~6 इंच) व्यास वाला और 25 सेंटीमीटर (~10 इंच) ऊँचाई वाला होता है। बायें वाले हिस्से को क्षेत्र अनुसार ''डग्गा'', ''डुग्गी'' अथवा ''धामा'' भी कहते हैं। पुराने प्राप्त चित्रों में दाहिने और बायें अंग का आकार लगभग समान पाया गया है और कभी कभी बायें का आकर छोटा भी।<ref name="atoday2014"/> हालाँकि, अब ''बायाँ'' का आकार ''तबले'' की तुलना में काफी बड़ा होता है। ''दाहिना'' या ''तबला'' बहुधा लकड़ी का बना होता है जबकि ''बायाँ'' मिट्टी (पके बर्तन के रूप में जिस पर चमड़ा मढ़ा जाय) का भी होता है अथवा दोनों ही पीतल या फूल (मिश्र-धातु) के भी बने हो सकते हैं। बायाँ, चौड़े मुँह वाला, चमड़े मढ़ा ड्रम होता है जिसका आकार लगभग 20 सेंटीमीटर (~8 इंच) व्यास वाला और 25 सेंटीमीटर (~10 इंच) ऊँचाई वाला होता है। दाहिने में डोरियों के बीच (जो अक्सर चमड़े की ही होती हैं) लकड़ी के छोटे आड़े बेलन बेलन लगे होते हैं, जिनपर हथौड़ी से चोट कर डोरियों के कसाव को बदला जा सकता है। इस क्रिया को सुर मिलाना कहते हैं। गायन-वादन के दौरान राग के मुख्य स्वर "सा" के साथ तबले की ध्वनि की तीक्ष्णता का मिलान किया जाता है, जिसे तबले को "षडज" पर मिलाना कहते हैं।<ref name=brittabla/><ref name="SorrellNarayan1980p40">{{cite book|author1=नील सोर्रेल |author2=राम नारायण |title=इंडियन म्यूजिक इन परफार्मेंस: अ प्रैक्टिकल इंट्रोडक्शन|url=https://books.google.com/books?id=jNhRAQAAIAAJ&pg=PA40|year=1980|publisher=Manchester University Press|isbn=978-0-7190-0756-9|pages=40–41}}</ref> सितार के साथ, चूँकि तार वाद्य और ऊँची तीक्ष्णता का वाद्य है, तबले को "पंचम" पर भी मिलाया जाता है। बायें को सामान्यतः, तबले की तुलना में निचले स्वरों "मन्द्र पंचम" पर सुर में रखा जाता है। कलाकार अपनी हथेली के पिछले हिस्से (मणिबंध) के दबाव द्वारा भी बायें के सुरों में मामूली बदलाव कर सकते हैं।<ref name=brittabla/><ref name="SorrellNarayan1980p40"/> इन दोनों अंगों के आकार में विषमता के कारण तीखे और चंचल बोल - ता, तिन, ना इत्यादि दाहिने पर बजाये जाते हैं और बायें का आकार बड़ा होने के कारण गंभीर आवाज वाले नाद धे, धिग इत्यादि बायें पर बजते हैं।<ref name="basic">{{cite web|title=मूल आवाजें और बोल|url=http://chandrakantha.com/tablasite/bsicbols.htm#Tu|website=chandrakantha.com|accessdate=26 फरवरी 2017|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20170426081855/http://chandrakantha.com/tablasite/bsicbols.htm#Tu|archive-date=26 अप्रैल 2017|url-status=dead}}</ref> इसीलिए "बायें" को "बेस ड्रम" की तरह प्रयोग में लाया जाता है। [[चित्र:Sudhir Ghorai and Subhadrakalyan Rana - Kolkata 2016-03-29 1947.JPG|अंगूठाकार|तबला तरंग, जिसमें केवल कई "दायें" अलग-अलग सुरों में मिला कर, सरगम के रूप में बजाये जाते हैं।]] तबलों के चमड़ा मढ़े मुख पर भी तीन हिस्से होते हैं: * चाट, चांटी, किनारा, किनार, की, या स्याही - सबसे किनारे का हिस्सा। * सुर, मैदान, लव, या लौ - स्याही और किनारे के बीच का भाग। * बीच, स्याही, सियाही, या गाँव - सबसे बीच का काला हिस्सा, जहाँ एक प्रकार का काला पदार्थ चिपका होता है, जिससे यह हिस्सा मोटा हो जाता है। तबले के प्रत्येक हिस्से के बीचोबीच एक काले चकत्ते के रूप में जो हिस्सा होता है उसे "स्याही" कहते हैं। यह मुख्य रूप से चावल या गेहूँ के मंड में कई प्रकार की चीजे मिला कर बनाया गया एक लेप होता है जो सूख कर कड़ा हो जाने के बाद तबले के चमड़े की स्वाभाविक धवनि का परिष्कार करके इसे एक खनकदार आवाज़ प्रदान करता है। तबला निर्माण की प्रक्रिया के दौरान स्याही का समुचित प्रयोग एक निपुणता की चीज है और इस वाद्ययंत्र की गुणवत्ता काफ़ी हद तक स्याही आरोपण की कुशलता पर निर्भर होती है। कुछ वादक, डुग्गी पर सियाही के बजाय, गूँधे गए आटे को चिपका कर सुखा लेते हैं, हालाँकि यह प्रक्रिया हर बार करनी पड़ती है और तबला वादन के बाद इसे खुरच कर हटा दिया जाता है। पंजाब में यह अभी भी प्रचलन में है और ऐसे "बायें" को "धामा" कहते हैं।<ref name="atoday2014" />
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