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== इतिहास == विदेशियों की शिक्षा का अध्ययन प्राचीन काल से चला आ रहा है। शैक्षिक विचारों का आदान प्रदान भी नवीन नहीं है। [[रोम]] ने [[यूनान]] पर सैनिक विजय प्राप्त करने के उपरांत विजेता की शिक्षा को अपनाया। [[भारत]] में भी विदेशी पर्यटकों, विद्वानों, एवं विद्यार्थियों का ताँता लगा रहा है। [[फ़ाहियान|फाहियान]], युवान च्युआंग ([[ह्वेन त्सांग|ह्वेन सांग]]) एवं इत्सिंग, तीनों चीनियों ने भारत की तत्कालीन शिक्षा का सम्यक् वर्णन एवं प्रशंसा लिखी है। यूरोपियन यात्रियों ने भी भारत की शिक्षा का उल्लेख किया है। भारत एवं यूरोप दोनों ही जगह शिक्षा के उपर्युक्त ढंग के उल्लेख किया है। भारत एवं यूरोप दोनों ही जगह शिक्षा के उपर्युक्त ढंग के उल्लेख महत्वपूर्ण होते हुए भी शास्त्रीय रीति से तुलनात्मक शिक्षा नहीं कहे जा सकते क्योंकि ये सभी अनियोजित, अक्रमिक एवं अवैज्ञानिक थे। अत: शास्त्रीय रूपप से इस विषय का अध्ययन 19वीं शताब्दी से माना जाता है। इस ज्ञानक्षेत्र के वास्तविक निर्माता मार्क एनटाँन जूलियन माने जाते हैं। इनके ग्रंथ में तुलनात्मक प्रणाली के पयोग का सुझाव दिया गया है। यद्यपि आज जूलियन तुलनात्मक शिक्षा का मूल निर्माता माना जाता है तथापि यह जानना आवश्यक है कि इसकी योजना लगभग बीसवीं शताब्दी के मध्य तक लुप्त रही इसलिये तुलनात्मक शिक्षाशास्त्रियों को इसका इतिहास संयोजित करने के हेतु शिक्षा रिपोर्टों की शरण लेनी पड़ी। 19वीं शताब्दी में कई प्रसिद्ध अमरीकनों एवं आंग्लों ने यूरोपीय शिक्षा संस्थानों का अपने राष्ट्र की शिक्षा के सुधार के दृष्टिकोण से अध्ययन किया। इनमें मुख्य थे: १) [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमरीका]] में नीफ (Neef), ग्रिसकम (Griscom), विक्टर कजिन (Victor Cousin), हीरेस मैल (Horace Mann), स्टो (Stowe), एवं वर्नाड (Barnard); २) इंग्लैंड में मैथ्यू आर्नल्ड (Mathew Arnold) व सर माइकिल सेडलर (Sir Michael Sadler)। इन्हीं मनीषियों के परिवेदन से तुलनात्मक शिक्षा के प्रारंभिक इतिहास बने। यह वृत्तांत वर्णनात्मक थे और प्राय: इनका लक्ष्य राष्ट्रीय शिक्षा सुधार था। क्रमश: तुलनात्मक शिक्षा का स्वरूप निखरने लगा और इस विषय ने सैद्धांतिक रूप लेना प्रारंभ किया। इसका मुख्य श्रेय रूसी शिक्षा शास्त्री हैंसन (Hessen) को हैं। इस शैली को प्रोत्साहन केंडल (Kandel) यूलिक (Ulich), वैरेडे (Bereday) एवं कई अन्य वर्तमान विद्वानों ने दिया है। द्वितीय-विश्व युद्ध से इस विषय को एक नई प्रेरणा मिली और इसके विकास व प्रगति ने तीव्र गति धारण की। सन् 1945 के बाद इस विषय पर बहुत सा साहित्य निकलने लगा और इसका अध्ययन संसार के कई देशों में होने लगा। प्राय: संसार की सभी प्रसिद्ध शिक्षा संस्थाओं में इसका अध्यापन होता है। इस विषय से संबंधित तीन बृहत् पुस्तकें विश्वकोषों के स्तर की हैं : (1) यिअर बुक ऑव ऐजुकेशन (2) इंटरनैशनल एजुकेशन (3) इंटरनैशनल यिअर बुक्र ऑव एजुकेशन [[युनेस्को|यूनेस्को]] (Unesco) ने तीन प्रकरण वर्ल्ड सर्वे ऑव एजुकेशन (World Survey of Education) प्रकाशित किए हैं। अमरीका, यूरोप और जापान में तुलनात्मक शिक्षा परिषदों की स्थापना क्रमश: 1956, 1961, एवं 1964 में हुई।
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