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== वैचारिक आन्दोलन, शास्त्रार्थ एवं व्याख्यान == '''वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है''' - इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारम्भ किया और जहां-जहां वे गये प्राचीन परम्परा के पण्डित और विद्वान उनसे हार मानते गये। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था। संस्कृत में वे धाराप्रवाह बोलते थे। साथ ही वे प्रचण्ड तार्किक थे। उन्होंने [[ईसाई]] और [[इस्लाम|मुस्लिम]] धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। अतएव अपनें चेलों के संग मिल कर उन्होंने तीन-तीन मोर्चों पर संघर्ष आरंभ कर दिया। दो मोर्चे तो ईसाइयत और इस्लाम के थे किन्तु तीसरा मोर्चा सनातनधर्मी हिन्दुओं का था। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था।। मगर सत्य यह था कि पौराणिक ग्रंथ भी वेद आदि शास्त्र में आते हैं। स्वामी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खण्डन करते थे। सर्वप्रथम उन्होंने उसी हिंदु धर्म में फैली बुराइयों व पाखण्डों का खण्डन किया, जिस हिंदु धर्म में उनका जन्म हुआ हुआ था, तत्पश्चात अन्य मत-पंथ व सम्प्रदायों में फैली बुराइयों का विरोध किया। इससे स्पष्ट होता है वे न तो किसी के पक्षधर थे न ही किसी के विरोधी नहीं थे। वे केवल सत्य के पक्षधर थे, समाज सुधारक थे व सत्य को बताने वाले थे। स्वामी जी सभी धर्मों में फैली बुराइयों का विरोध किया चाहे वह [[सनातन धर्म]] हो या [[इस्लाम]] हो या [[ईसाई]] धर्म हो। अपने महाग्रंथ [[सत्यार्थ प्रकाश]] में स्वामीजी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है वह भी अपनी बुद्धि के हिसाब से है। उनके समकालीन सुधारकों से अलग, स्वामीजी का मत शिक्षित वर्ग तक ही सीमित नहीं था अपितु [[आर्य समाज]] ने आर्यावर्त (भारत) के साधारण जनमानस को भी अपनी ओर आकर्षित किया। सन् १८७२ ई. में स्वामी जी कलकत्ता पधारे। वहां [[देवेन्द्रनाथ ठाकुर]] और [[केशवचन्द्र सेन]] ने उनका बड़ा सत्कार किया। [[ब्रह्म समाज|ब्राह्मो समाजियों]] से उनका विचार-विमर्श भी हुआ किन्तु ईसाइयत से प्रभावित ब्राह्मो समाजी विद्वान पुनर्जन्म और वेद की प्रामाणिकता के विषय में स्वामी से एकमत नहीं हो सके। कहते हैं कलकत्ते में ही [[केशवचन्द्र सेन]] ने स्वामी जी को यह सलाह दे डाली कि यदि आप [[संस्कृत]] छोड़ कर आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना आरम्भ कर दें तो देश का असीम उपकार हो सकता है। ऋषि दयानन्द को स्पष्ट रूप से हिंदी नहीं आती थी। वे [[संस्कृत]] में पढ़ते-लिखते व बोलते थे और जन्मभूमि की भाषा गुजरती थी इसलिए उन्हें हिंदी अथार्त आर्यभाषा का विशेष परिज्ञान न था (देखें, सत्यार्थ प्रकाश द्वितीय संस्करण की भूमिका)। तभी से स्वामी जी के व्याख्यानों की भाषा आर्यभाषा (हिन्दी) हो गयी और आर्यभाषी (हिन्दी) प्रान्तों में उन्हे अगणित अनुयायी मिलने लगे। [[कोलकाता|कलकत्ते]] से स्वामी जी [[मुम्बई]] पधारे और वहीं १० अप्रैल १८७५ ई. को उन्होने '[[आर्य समाज]]' की स्थापना की। मुम्बई में उनके साथ [[प्रार्थना समाज]] वालों ने भी विचार-विमर्श किया। किन्तु यह समाज तो ब्राह्मो समाज का ही मुम्बई संस्करण था। अतएव स्वामी जी से इस समाज के लोग भी एकमत नहीं हो सके। मुम्बई से लौट कर स्वामी जी इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) आए। वहां उन्होंने सत्यानुसन्धान के लिए ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलायी। किन्तु दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद भी लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। इन्द्रप्रस्थ से स्वामी जी [[पंजाब]] गए। पंजाब में उनके प्रति बहुत उत्साह जाग्रत हुआ और सारे प्रान्त में आर्यसमाज की शाखाएं खुलने लगीं। तभी से पंजाब आर्यसमाजियों का प्रधान गढ़ रहा है।
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