सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
नूरजहां (गायिका)
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== प्रमुख फिल्में == {| border="2" cellpadding="4" cellspacing="0" width="95%" style="margin: 1em 1em 1em 0; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |- bgcolor="#CCCCCC" align="center" ! वर्ष !! फ़िल्म !! चरित्र !! टिप्पणी |- |[[:श्रेणी:1953 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1953]] || [[दो बीघा ज़मीन]] || || |- |[[:श्रेणी:1946 में बनी हिन्दी फ़िल्म|1946]] || [[अनमोल घड़ी]] || || |- |} === प्रवेश === फिल्म गुले बकावली में नूरज़हां को रोल कैसे मिला ये भी एक रोचक किस्सा है| केवल 19 साल की थीं वे उस समय| बचपन से उनका कंठस्वर अत्यंत मधुर था| नूरज़हां के माता-पिता को उनके शुभचिंतक यही राय देते थे कि लड़की को फिल्मों में प्रवेश दिला दो, बहुत नाम पैदा करेगी| नूरज़हां की रुचि भी फिल्मों में काम करने की थी अतः वे रोज [[लाहौर]] के पांचोली स्टुडिओ के फाटक के पास जाकर खड़ी हो जाया करती थीं और स्टुडिओ के मालिक दिलसुख एम. पांचोली की गाड़ी के फाटक के पास आते ही गाना गाना शुरू कर देती थीं| कुछ ही दिनों में नूरज़हां की मधुर आवाज ने पांचोली साहब का ध्यान आकृष्ट कर लिया और उन्हें अपनी फिल्म गुले बकावली में भूमिका दे दी| इस पंजाबी फिल्म के संगीतकार थे गुलाम हैदर साहब जिन्होंने नूरज़हां को गाने की तकनीक सिखलाई| नूरज़हां की पहली हिंदी फिल्म [[१९४२|1942]] में बनी [[खानदान (1942)|खानदान]] थी जिसमें [[प्राण]] ने नायक की भूमिका निभाई थी| देश के विभाजन होने पर नूरज़हां [[पाकिस्तान]] चली गईं जहाँ कि उनकी आवाज वर्षों तक गूंजती रही और उन्हें [[मलिका-ए-तरन्नुम]] का खिताब मिला|
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)