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== अधिकारियों की भूमिका == कारखाने के प्रत्येक कार्य में प्रधान कार्य कर्मचारियों पर ही निर्भर रहता है। कर्मचारी ही कार्य संचालन की महत्वपूर्ण इकाई होता है। भले ही तकनीकी ढंग से प्रशिक्षण प्राप्त हो या नहीं, फिर भी उसी के द्वारा उत्पादन का प्रथम चरण आरंभ होता है। कर्मचारी के बाद सुपरवाइजर फिर कार्य की प्रवृत्ति के अनुरूप विभिन्न प्रकार के एक ऊपर एक अधिकारी होते हैं। अधिकारी के अनेक कार्य होते है। अधिकारी कार्य का सुचारू रूप से संचालन, कर्मचारी की जिम्मेदारियां, उत्पादन की मात्रा, उसका गुण आदि पक्षों को देखता है। दूसरी ओर वह कर्मचारियों को समय-समय पर निर्देश देना, उन पर नियत्रंण रखना, उनके आपसी झगड़ों का निपटारा, उनकी उचित-अनुचित मांगों को ध्यान से सुनना तथा उनका निवारण करना आदि कार्य अधिकारी के कार्य क्षेत्र में आते हो जिन पर अधिकारी को हर समय तत्पर रहना होता है। यदि ऐसा न हुआ तो व्यवस्था में भंग हो जाती हैं। जिससे उत्पादन, कर्मचारी तथा प्रंबधक इससे प्रभावित होते हैं। === नेता के रूप में अधिकारी === कर्मचारियों के कार्य के निरीक्षण हेतु सुपरवाइजर नेता होते हैं। उत्पादन के लिए यह आवश्यक होता हैं कि कर्मचारी अपने कार्य के साथ समायोजन करें। कर्मचारियों का यह समायोजन अधिकारियों और उनकी शासन प्रणाली पर निर्भर करता है। उद्योगों में अव्यवस्था जैसे हड़ताल, तालाबंदी, कर्मचारी एवं प्रबंधकों के बीच आपसी संबंध आदि ऐसे पक्ष हैं जिनका संबंध कर्मचारी और प्रबंधकों की गलत फहमी से होता हैं। लेकिन जो प्रमुख कारण है वह है बुद्धिहीन नेतृत्व। नेतृत्व ही ऐसा विकल्प है जो कार्य-प्रणाली में संतुलन बनाये रखता है। इस प्रकार का नेतृत्व अधिकारी वर्ग करता है इसलिए अधिकारी या प्रबंधक को नेता की संज्ञा दी जाती है। उद्योग में वेतन तथा अन्य सुविधाएं प्राप्त करने वाले कर्मचारियों में कई कर्मचारी ऐसे होते जो मन लगाकर सम्पूर्ण शक्ति से कार्य करते हैं। जबकि कई कर्मचारी ऐसे भी होते हैं जो कार्य में बाधा डालते हैं। इसी प्रकार के कर्मचारी नेता के लिए समस्या पैदा करते हैं। ऐसे कर्मचारियों से व्यावहारिक तारतम्य बना लेना ही नेतृत्व की विशेषताएं और शीलगुण हैं। === अधिकारियों की मनोवैज्ञानिक भूमिका === अधिकारियों को कर्मचारियों के सम्पर्क में रहना चाहिए, उन्हें उद्योग में एक इकाई के रूप में मानना चाहिए। इससे आपसी मतभेद, घृणा, द्वेष आदि को कम किया जा सकता है। कर्मचारी भी अधिकारियों की तरह एक सम्भ्रांत व्यक्ति होता है, उसकी भी अपनी मान-प्रतिष्ठा होती है। अधिकारी ऐसा व्यवहार न करे जिससे कर्मचारी यह महसूस करे कि उसे अलग समझा जा रहा है या उससे दबाब पूर्वक कार्य लिया जा रहा है। अधिकारी को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि कर्मचारी की भी अपनी इच्छाएं होती हैं। वे उद्योग में एक महान शक्ति के रूप में हैं। यह संगठन ही उद्योग की भलाई और उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसलिए अधिकारियों व मालिकों को इस संगठन के लिए अच्छे विचार रखने चाहिए जिससे संगठन के अंदर बुरी भावनाएं पैदा न हों। विपरीत जा रहे कर्मचारियों को सही मार्ग-दर्शन देना चाहिए, उनके बीच में विचार गोष्ठी का आयोजन करना चाहिए तथा उनके विचारों को सही दिशा देनी चाहिए। कर्मचारियों के हित की बात अधिकारियों को सोचनी चाहिए तथा उनकी उचित मांगों को ध्यान में रखना चाहिए। कर्मचारियों की मांग वेतन, लाभांश आदि से सम्बंधित होती हैं। अपनी चिकित्सा और निवास सम्बंधी मांगों को भी वे महत्व देते हैं। वे समाजोत्थान की बात भी करते हैं लेकिन उद्योग में अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं। तोड़-फोड़, अनशन, हड़ताल आदि सिलसिला चलता रहता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में ही प्रबंधकों, मालिकों तथा अधिकारियों को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। कर्मचारी की वृत्तियों तथा मांगों को गम्भीरता से लेना चाहिए। यह याद रहे कि मूल्यवृद्धि के साथ मंहगाई भत्ते की मांग भी उचित है। ऐसी परिस्थितियों में अधिकारियों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के साथ विचार गोष्ठी रखें और आपसी विचार-विमर्श द्वारा एक-दूसरे को समझें तथा समझौते के द्वारा समस्या का हल निकालें। हमेशा सही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अधिकारियों की योग्यता एवं गुण इसी बात का परिचालक है कि वे नजदीक से एक-दूसरे को समझें।
सारांश:
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