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प्रथम चीन-जापान युद्ध
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==युद्ध की घटनायें एवं परिणाम== [[चित्र:Matsushima(Bertin).jpg|right|thumb|250px|प्रथम चीन-जापान युद्ध में जापानी नौसेना की रीढ़ : '''मात्सुशिमा''']] यह युद्ध लगभग नौ महीनों तक चला जिसमें जापानियों की विजय हुई। जापान की सैनिक तैयारियाँ बहुत ही श्रेष्ठ थीं। जापान की डेढ़ लाख सेना को श्रेष्ठ प्रशिक्षण दिया गया था। जापानी सैनिकों को यथासंभव वेतन मिलता था और उनके जनरल अनुभवी और अत्यंत योग्य थे। उन्हें गोला-बारूद और अन्य रसद की वस्तुएँ यथासमय तथा आवश्यकतानुसार मिलती थीं। जापानी नौसेना में पर्याप्त संख्या में यात्री जहाज थे, जो सेना अथवा युद्ध सामग्री एक रक्षणेत्र से दूसरे में शीघ्रता से पहुँचाया करते थे। इसके विपरीत, चीन की सेना एकदम बेकार थी। उसके पास न शस्त्र थे और न उसके सैनिक प्रशिक्षित थे तथा सैनिकों को नियमित वेतन भी नहीं मिलता था। उसके सेनापति भी अयोग्य थे। इसके अतिरिक्त चीन का शासन प्रबंध भी दूषित और भ्रष्ट था। ऐसी स्थिति में चीन की पराजय अवश्यंभावी थी। वस्तुतः, युद्ध के प्रारंभ और अंत तक कभी और चीन को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। सितम्बर के अंत तक चीनी सेना को कोरिया से भागना पड़ा और [[यालू नदी]] की मुठभेड़ में चीनी बेड़े की भीषण पराजय हुई। जापान की एक सेना ने [[मंचूरिया]] पर और दूसरी ने [[लियाओतुंग]] प्रायद्वीप पर आक्रमण किया। [[किंगचाऊ]] और [[टांकिन]] का पतन हो गया और नवम्बर में [[पोर्ट आर्थर]] पर भी जापान ने अधिकार कर लिया। 1895 ई. के प्रारंभ में जापान की सेनाएँ [[शानदोंग|शांतुंग]] जा पहुँची जो कोरिया के दूसरे छोर पर स्थित था। फरवरी के मध्य तक [[बेईहाईवेई]] का भी पतन हो गया। उत्तर में कई चीनी रक्षा चौकियों पर जापान ने अधिकार कर लिया। इसके उपरांत जापान की सेनाएँ चीन की राजधानी की ओर बढ़ने लगीं। इस स्थिति में चीन की सरकार ने जापान के साथ [[संधि (व्याकरण)|संधि]] कर लेना ही उचित समझा।
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