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===उभरती सितारा (1952-56)=== [[1952]] में आई फिल्म ''[[बैजू बावरा (1952 फ़िल्म|बैजू बावरा]]'' ने मीना कुमारी के फिल्मी सफ़र को नई उड़ान दी। मीना कुमारी द्वारा अभिनीत गौरी के किरदार ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्धि दिलाई। फिल्म 100 हफ्तों तक परदे पर रही और 1954 में उन्हें इसके लिए पहले फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। [[1953]] तक मीना कुमारी की तीन फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : ''दायरा'', ''[[दो बीघा ज़मीन]]'' और ''[[परिणीता]]'' शामिल थीं। ''परिणीता'' से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूँकि इस फिल्म में भारतीय नारी की आम जिंदगी की कठिनाइयों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू छाया रहा और लगातार दूसरी बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए चयनित किया गया। [[1954]] से [[1956]] के बीच मीना कुमारी ने विभिन्न प्रकार की फिल्मों में काम किया। जहाँ ''चाँदनी चौक'' (1954) और ''[[एक ही रास्ता (1956 फ़िल्म)|एक ही रास्ता]]'' (1956) जैसी फिल्में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करती थीं, वहीं ''अद्ल-ए-जहांगीर'' (1955) और ''हलाकू'' (1956) जैसी फिल्में तारीख़ी किरदारों पर आधारित थीं। 1955 की फ़िल्म ''[[आज़ाद (1955 फ़िल्म)|आज़ाद]]'', [[दिलीप कुमार]] के साथ मीना कुमारी की दूसरी फिल्म थी। ट्रेजेडी किंग और ट्रेजेडी क्वीन के नाम से प्रसिद्ध दिलीप और मीना के इस हास्य प्रधान फ़िल्म ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। मीना कुमारी के उम्दा अभिनय ने उन्हें [[फ़िल्मफ़ेयर]] ने [[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार]] के लिए नामांकित भी किया। फ़िल्म ''[[आज़ाद (1955 फ़िल्म)|आज़ाद]]'' के गाने "अपलम चपलम" और "ना बोले ना बोले" आज भी प्रचलित हैं।
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