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=== विकास के पथ पर === नायक के रूप में राज कपूर का फ़िल्मी सफ़र 'हिन्दी सिनेमा की वीनस' मानी जाने वाली सुप्रसिद्ध अभिनेत्री [[मधुबाला]] के साथ आरंभ हुआ। 1946-47 में प्रदर्शित केदार शर्मा की '[[नीलकमल (1947 फ़िल्म)|नीलकमल]]' तथा मोहन सिन्हा के निर्देशन में बनी '[[चित्तौड़ विजय]]' और '[[दिल की रानी]]' तथा 1948 में एन॰एम॰ केलकर द्वारा निर्देशित '[[अमर प्रेम (1948 फ़िल्म)|अमर प्रेम]]' में भी मधुबाला ही राज कपूर की नायिका थी। [[नरगिस]] के अतिरिक्त मधुबाला के साथ ही राज कपूर ने सबसे अधिक फिल्मों में नायक की भूमिका की है। परंतु, इनमें सफल केवल 'नीलकमल' ही हुई। अन्य फिल्मों की असफलता के कारण उन्हें भुला दिया गया। 1948 में प्रदर्शित '[[आग (1948 फ़िल्म)|आग]]' वह पहली फिल्म थी जिसमें अभिनेता के साथ साथ निर्माता-निर्देशक के रूप में भी राज कपूर सामने आये। हालाँकि यह फिल्म सफल नहीं हो पायी। 'आग' के प्रदर्शन के साथ ही राज कपूर की छवि एक विवाद ग्रस्त व्यक्तित्व के रूप में बनी। 'आग' स्थापित परम्पराओं का अनुकरण नहीं करती थी, किन्तु वह अपनी अलग पहचान भी नहीं बना सकी। 'आग' के बाद 1949 में राज कपूर '[[बरसात (1949 फ़िल्म)|बरसात]]' फिल्म में अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक के रूप में भी पुनः उपस्थित हुए और इस फिल्म ने सफलता का नया मानदंड कायम कर दिया। इस फिल्म की लगभग पूरी टीम ही नयी थी। संगीतकार नये थे-- [[शंकर-जयकिशन]]। गीतकार नये थे-- [[हसरत जयपुरी]] और [[शैलेन्द्र]]। लेखक नया था-- [[रामानन्द सागर]]। फिल्म की नायिका भी नयी थी-- [[निम्मी]]। इतना ही नहीं राधू कर्मकार, एम॰आर॰ अचरेकर और जी॰जी॰ मायेकर जैसे नये टैक्नीशियनों की पूरी टीम थी। इन कारणों से लोग कहते थे 'आग' में जो कुछ जलने से रह गया है वह 'बरसात' में बह जाएगा।<ref>प्रदीप चौबे, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक ([[वसुधा|प्रगतिशील वसुधा]], अंक-81, अप्रैल-जून, 2009; {सिनेमा विशेषांक}), संपादक- [[प्रहलाद अग्रवाल]], (पुस्तक रूप में 'साहित्य भंडार', 50, चाहचंद रोड, इलाहाबाद से प्रकाशित) पृष्ठ-128.</ref> लेकिन राज कपूर ने किन्हीं की बातों पर ध्यान नहीं दिया। सिर्फ एक वर्ष के समय में 'बरसात' पूरी हो गयी और 1949 में 'बरसात' के प्रदर्शन के साथ ही हिन्दी सिनेमा में विस्मय का विस्फोट हुआ। शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, रामानन्द सागर, निम्मी और सारे टैक्नीशियन रातों-रात चोटी पर पहुँच गये। 'बरसात' का संगीत देश-काल की सीमाओं को लाँघ गया। चारों ओर [[मुकेश]] और लता के गाये हुए गीतों की धुन थी। गायिका [[लता मंगेशकर]] की पहचान भी 'बरसात' फिल्म में ही मुख्यतः बन पायी। 'बरसात' पूरी तरह एक नयी फिल्म थी जिसकी नसों में पूरा का पूरा नया खून था। इतनी ताजगी और स्वनिर्मिती के साथ जुड़कर इस तरह सफल होने का दूसरा कोई उदाहरण आजादी के बाद के हिन्दी सिनेमा के पास नहीं है।<ref name="अ">{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1405-6 |page=42 |edition=प्रथम (परिवर्धित)}}</ref> 'बरसात' की ही प्रचंड सफलता का यह परिणाम था कि इसके अगले वर्ष अर्थात् सन् 1950 में नायक के रूप में राज कपूर की छह फिल्में आयीं। राज कपूर के पूरे नायक युग में एक वर्ष में इससे अधिक फिल्में कभी नहीं आयीं। इस वर्ष नरगिस के साथ उनकी '[[जान पहचान (1950 फ़िल्म)|जान पहचान]]' और '[[प्यार (1950 फ़िल्म)|प्यार]]' फिल्में आयीं। केदार शर्मा के निर्देशन में [[गीता बाली]] के साथ '[[बावरे नयन (1950 फ़िल्म)|बावरे नयन]]', ए॰आर॰ कारदार के निर्देशन में [[सुरैया]] के साथ '[[दास्तान (1950 फ़िल्म)|दास्तान]]', जी॰ राकेश के निर्देशन में [[निम्मी]] के साथ '[[भँवरा (1950 फ़िल्म)|भँवरा]]', और [[रेहाना]] के साथ पी॰एल॰ सन्तोषी के निर्देशन में '[[सरगम (1950 फ़िल्म)|सरगम]]' सन् 1950 में रिलीज होने वाली फिल्में थीं। इनमें कारदार की 'दास्तान' सबसे अधिक सफल रही। यह एकमात्र फिल्म है जिसमें राज कपूर, सुरैया के साथ नायक बने। 'सरगम', 'दास्तान' और 'बावरे नयन' का संगीत अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। 'सरगम' और 'बावरे नयन' भी टिकट-खिड़की पर सफल रहीं। इसके बाद तो [[महबूब ख़ान|महबूब]], केदार शर्मा, नितिन बोस, [[बिमल राय|विमल राय]], महेश कौल, [[वी शांताराम]] जैसे महामहिमों के रहते नौसिखए राज कपूर ने अपनी फिल्म '[[आवारा (1951 फ़िल्म)|आवारा]]' से साबित कर दिया कि वह हर मोर्चे पर बड़े-बड़े दिग्गजों के हौसले पस्त कर सकता है।<ref name="अ" />
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