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===संगीत अन्वीक्षण और लेखन=== {{quote box |quote = "लोक संगीत ही राष्ट्र का प्राण है।"|source= — रामशरण दर्नाल<ref name="Indra ">{{Citation|last=श्रेष्ठ|first=इंद्र कुमार 'सरित'|title="लोकसङ्गीत नै राष्ट्रको प्राण हो," रामशरण दर्नाल|trans-title="लोक संगीत ही राष्ट्र का प्राण है," रामशरण दर्नाल|journal= विवेक|volume=7|issue=4|date=19 अप्रैल 1988}}</ref> |align = right |width = 350px |border = 1px |bgcolor= #FFFFF0 |fontsize = 90% }} {{quote box |quote = "नेपाली संगीत और संस्कृति का रिश्ता नाखून और उँगलियों के रिश्ते जैसे ही गहरा होता है।"|source= — रामशरण दर्नाल<ref name="Chetnath">{{Citation|last=धमला|first=चेतनाथ|title="सङ्गीत र संस्कृति : नङ र मासुजस्तो," रामशरण दर्नाल|trans-title="संगीत और संस्कृति : नाखून और ऊँगली जैसे," रामशरण दर्नाल|journal= नेपाल जागरण साप्ताहिक|volume=11|issue=5|date=2002}}</ref> |align = right |width = 350px |border = 1px |bgcolor= #FFFFF0 |fontsize = 90% }} खुद को संगीत अन्वीक्षण और अनुसंधान को समर्पित किए दर्नाल ने परंपरागत वाद्य-यंत्र और लोक संगीत की खोज में [[सुदूरपश्चिम प्रदेश]] के दुर्गम गाँवों समेत संपूर्ण नेपाल की यात्रा की। माना जाता है की उन्होंने अपने सफ़र में हुड़का सहित कुल 365 क़िस्म के बाजाएँ इकट्ठे किए। <ref name="Nayapatrika">{{citation|title=बाजा-संवाद : रामशरण दर्नालसँग|trans-title= बाजा संवाद: रामशरण दर्नाल के साथ |first= दीपक |last= सापकोटा |date=30 अक्टूबर 2009|publisher=गोरखापत्र}}</ref> उन्हें आधिकारिक अभिलेखों में वाद्य-यंत्रों के पंजीकरण की शुरुआत करनेवाले पहले शख़्स के रूप से जाना जाता है। 1968 में भारी मानसून बरसात की वजह से दर्नाल का घर ढह गया, जिसके नीचे उनकी माँ और अन्य 15 क़िस्म के बाजाएँ दब गए। इस घटना को वे अपने जीवन के न्यूनतम बिंदु मानते थे। बाद में संगीत से मुड़कर साहित्य की तरफ़ ज़्यादा सक्रिय होने पर उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया। 1967 के आसपास उन्होंने [[वाराणसी]] में स्थित ''सँगालो'' नामक अख़बार में अपना पहला लेख, "नेपाली संस्कृति में वाद्यवादन का स्थान" प्रकाशित किया। एक साल बाद सो लेख को संशोधित करके ''[[गोरखापत्र]]'' में प्रकाशित किया गया। उन्होंने कुल मिलाकर नेपाली संगीत और 375 विलुप्तप्राय परंपरागत बाजाओं पर आधारित 11 किताबें लिखे, जो 1960 के दशक में नेपाल में दुर्लभ थीं। <ref name="yalambartimes"/><ref name="Gorkhapatra ">{{citation|title= बाजाबारे सोधखोज नहुँदा|trans-title= बाजाओं के बारे में सवाल न उठने पर |first= नरेश |last= खपांगी मगर|date=24 अगस्त 2003|publisher= गोरखापत्र }}</ref><ref name="Gorkhapatra3 ">{{citation|title=छाप्रोमै बसेर लेखेँ|trans-title= झोपड़ी में बैठकर लिखा |first= जयदेव |last= भट्टराई |date=19 सितंबर 2009|publisher= गोरखापत्र }}</ref> [[बिसे नगर्ची]] की जीवनी के अध्ययन शुरू करनेवाले दर्नाल को मेहनत और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। <ref name="Annapurna1 ">{{citation|title=आ-आफ्नै पङ्ख उचाली|trans-title= खुद के पर उठाकर |first= गोपीकृष्ण|last= ढुंगाना |date=21 जनवरी 2009|publisher= अन्नपूर्ण पोस्ट}}</ref>
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