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== पुन: विदेश गमन == [[Image:Paris Bande Mataram 17 August 1909.jpg|thumb|right|150px|अगस्त १९०९ का वन्दे मातरम पत्रिका का पैरिस से प्रकाशित हुआ संस्करण।]] १९०८ में फिर सरकारी दमन चक्र चला। लाला जी के आग्नेय प्रवचनों के परिणामस्वरूप विद्यार्थी कॉलेज छोड़ने लगे और सरकारी कर्मचारी अपनी-अपनी नौकरियाँ। भयभीत सरकार इन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाने में जुट गयी। [[लाला लाजपत राय]] के परामर्श को शिरोधार्य कर आप फौरन [[पेरिस]] चले गये और वहीं रहकर [[जेनेवा]] से निकलने वाली मासिक पत्रिका [[वन्दे मातरम्]] का सम्पादन करने लगे।<ref name="इनखबर" /> [[गोपाल कृष्ण गोखले]] जैसे मॉडरेटों की आलोचना अपने लेखों में खुल कर किया करते थे। हुतात्मा [[मदनलाल ढींगरा]] के सम्बन्ध में उन्होंने एक [[लेख]] में लिखा था - "इस अमर वीर के शब्दों एवं कृत्यों पर शतकों तक विचार किया जायेगा जो मृत्यु से नव-वधू के समान प्यार करता था।" [[मदनलाल ढींगरा]] ने [[फाँसी]] से पूर्व कहा था - "मेरे [[राष्ट्र]] का अपमान [[परमात्मा]] का अपमान है और यह अपमान मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता था अत: मैं जो कुछ कर सकता था वही मैंने किया। मुझे अपने किये पर जरा भी पश्चात्ताप नहीं है। " लाला हरदयाल ने [[पेरिस]] को अपना प्रचार-केन्द्र बनाना चाहा था किन्तु वहाँ पर इनके रहने खाने का प्रबन्ध प्रवासी [[भारतीय]] देशभक्त न कर सके। विवश होकर वे सन् १९१० में पहले [[अल्जीरिया]] गये बाद में एकान्तवास हेतु एक अन्य स्थान खोज लिया और लामार्तनीक द्वीप में जाकर [[महात्मा बुद्ध]] के समान तप करने लगे। परन्तु वहाँ भी अधिक दिनों तक न रह सके और [[भाई परमानन्द]] के अनुरोध पर हिन्दू संस्कृति के प्रचारार्थ [[अमरीका]] चले गये। तत्पश्चात् [[होनोलूलू]] के समुद्र तट पर एक गुफा में रहकर [[आदि शंकराचार्य]], [[काण्ट]], [[हीगल]] व [[कार्ल मार्क्स]] आदि का अध्ययन करने लगे। [[भाई परमानन्द]] के कहने पर इन्होंने [[कैलिफोर्निया]] विश्वविद्यालय में हिन्दू दर्शन पर कई व्याख्यान दिए। अमरीकी बुद्धिजीवी इन्हें हिन्दू सन्त, [[ऋषि]] एवं स्वतन्त्रता सेनानी कहा करते थे। १९१२ में स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में हिन्दू दर्शन तथा [[संस्कृत]] के ऑनरेरी [[प्रोफेसर]] नियुक्त हुए। वहीं रहते हुए आपने [[गदर]] पत्रिका निकालनी प्रारम्भ की। [[पत्रिका]] ने अपना रँग दिखाना प्रारम्भ ही किया था कि [[जर्मनी]] और [[इंग्लैण्ड]] में भयंकर युद्ध छिड़ गया। लाला जी ने विदेश में रह रहे सिक्खों को स्वदेश लौटने के लिये प्रेरित किया। इसके लिये वे स्थान-स्थान पर जाकर प्रवासी [[भारतीय]] सिक्खों में ओजस्वी व्याख्यान दिया करते थे। आपके उन व्याख्यानों के प्रभाव से ही लगभग दस हजार पंजाबी सिक्ख भारत लौटे। कितने ही रास्ते में गोली से उड़ा दिये गये। जिन्होंने भी विप्लव मचाया वे सूली पर चढ़ा दिये गये। लाला हरदयाल ने उधर [[अमरीका]] में और [[भाई परमानन्द]] ने इधर [[भारत]] में क्रान्ति की अग्नि को प्रचण्ड किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों ही गिरफ्तार कर लिये गये। [[भाई परमानन्द]] को पहले [[फाँसी]] का दण्ड सुनाया गया बाद में उसे [[काला पानी]] की सजा में बदल दिया गया परन्तु हरदयाल जी अपने बुद्धि-कौशल्य से अचानक [[स्विट्ज़रलैण्ड]] खिसक गये और [[जर्मनी]] के साथ मिल कर [[भारत]] को स्वतन्त्र करने के यत्न करने लगे। महायुद्ध के उत्तर भाग में जब [[जर्मनी]] हारने लगा तो लाला जी वहाँ से चुपचाप [[स्वीडन]] चले गये। उन्होंने वहाँ की [[भाषा]] आनन-फानन में सीख ली और स्विस भाषा में ही [[इतिहास]], [[संगीत]], [[दर्शन]] आदि पर व्याख्यान देने लगे। उस समय तक वे [[विश्व]] की तेरह भाषाएं पूरी तरह सीख चुके थे।<ref name="इनखबर" />
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