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===भारतीय दृष्टिकोण=== भारतीय दृष्टिकोण सदा अध्यात्मवादी रहा है। किसी भी भौतिक कृति को जो थोड़ी भी आश्चर्यजनक होती है तथा जिसमें नवीनीकरण रहता है उसे दैवीय कृति ही माना जाता है। यही कारण है कि आदि ग्रन्थ [[वेद]] को अपौरुषेय कहा जाता है, वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति ब्रह्मा से जोड़ी जाती है तथा भारतीय लिपि [[ब्राह्मी]] को [[ब्रह्मा]] द्वारा निर्मित बताई जाती है। भारतीय लेखन-कला के उद्धव के सम्बन्ध में भी भारतीय दृष्टिकोण कुछ इसी प्रकार का प्रतीत होता है। [[बादामी]] से ईसवी सन् [[५८०|580]] का एक प्रस्तर-खण्ड प्राप्त हुआ है जिसपर ब्रह्मा की आकृति बनी है। उनके हाथ में ताड़-पत्रों का एक समूह है। यह स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रमाण है कि ब्राह्मा से ही लेखन-कला का सम्बन्ध जोड़ा गया है। [[नारदस्मृति]] में लिपि के उद्भव के समब्न्ध में एक श्लोक आया है-<ref>[https://books.google.co.in/books?id=iu9J0U2m2LsC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false भारतीय पुरालेखों का अध्ययन] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20181110080517/https://books.google.co.in/books?id=iu9J0U2m2LsC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false |date=10 नवंबर 2018 }} (लेखक-शिवस्वरूप सहाय)</ref> : ''ना करिष्यति यदि ब्रह्मा लिखितं चक्षुरुत्तमम्। : ''तदेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभाङ्गतिः ॥ :: अर्थात् यदि ब्रह्मा 'लेखन' के रूप में उत्तम नेत्र का विकास नहीं करते तो तीनों लोकों को शुभ गति नहीं प्राप्त होती। [[वृहस्पति स्मृति]] में भी इसी प्रकार यह लिखा है कि पहले सृष्टि-कर्त्ता ने अक्षरों को पत्तों पर अंकित करने का विधान किया क्योंकि छः मास में किसी भी वस्तु के सम्बन्ध में स्मृति विभ्रमित हो जाती थी। बौद्ध ग्रन्थ [[ललितविस्तर सूत्र]] में [[६४|64]] लिपियों का उल्लेख किया गया है। उनमें से सबसे पहले ब्राह्मी लिपि का उल्लेख है। [[जैन धर्म|जैन ग्रन्थों]] में एक प्रसंग आता है कि [[ऋषभ नाथ]] को एक लड़की थी। उसका नाम बम्पी था। उसी को पढ़ाने के लिए उन्होंने एक लिपि को विकसित किया। इसी से बम्पी को पढ़ाने के लिए निकाली गई लिपि ब्राह्मी कहलाई। यहीं समवायंणसूत्र एवं पणवणासूत्र में [[१८|18]] लिपियों का वर्णन मिलता है जिनमें प्रथम नाम ब्राह्मी का है।
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