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==प्रयोजनवाद की आलोचना== प्रयोजनवादी दर्शन ‘प्रगति गामी शिक्षा’ के आन्दोलन के रूप में प्रस्फुटित हुआ परन्तु आज उसकी सफलता के संबंध में अनेक आशंकायें उठाई जा रही हैं। कारण स्पष्ट है कि प्रयोजनवाद ने अपने अनिश्चित उद्देश्यों से, साधन को साध्य से अधिक महत्व देकर तथा मनुष्य की मूल्यों के क्षेत्र में रचनात्मकता इत्यादि सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके अपूर्ण विचारधारा होने का परिचय दिया है। प्रयोजनवादी दर्शन के सम्बन्ध में कुछ विचारणीय बिन्दु इस प्रकार हैं – *(१) कार्य (क्रिया) सदैव विचार से अधिक महत्वशाली नहीं हो सकता। विचार क्रिया से ही उत्पन्न नहीं होता अपितु अनेक बार विचार की परिणति क्रिया में होती है। *(२) इस दर्शन का आध्यात्मिकता में कोई विश्वास नहीं है। प्रयोजनवादी अनुभव में यथार्थ का अस्तित्व मानता है किन्तु उन व्यक्तियों का मार्ग अवरूद्ध कर देता है जो आध्यात्मिकता को कल्पना की वस्तु न मानकर अनुभव की ही वस्तु मानते हैं और जिन्हें आध्यात्मिकता की अनुभूति बराबर होती रहती है। *(३) प्रयोजनवाद में एक नकारात्मकता परिलक्षित होती है। स्थापित सिद्धान्तों एवं मूल्यों को इन्कार करने के अलावा प्रयोजनवाद ने और कुछ नहीं किया। नये सिद्धान्त एवं मूल्य स्थापित करने में प्रयोजनवाद असफल रहा। *(४) प्रयोजनवाद जीवन की सभी समस्याओं के विचार के लिए [[वैज्ञानिक विधि]] का उपयोग करता है जबकि दूसरी ओर विज्ञान के अमानुषिक विवेचन की भर्त्सना भी करता है। यह एक विरोधाभास सा दिखाई देता है। इसके अलावा जीवन के भावनात्मक एवं आध्यात्मिक प्रश्नों के विवेचन के लिए अन्य प्रकार की विधि अपेक्षित होगी। *(५) प्रयोजनवाद ने चिरन्तन मूल्यों की उपेक्षा करके शैक्षिक उद्देश्यों को निम्न स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। उनके अनुसार [[शिक्षा]] का कोई निश्चित उद्देश्य नहीं होता। बिना उद्देश्यों के शिक्षा देने से तो अच्छा यही जान पड़ता है कि शिक्षा दी ही न जाय, क्योंकि सुशिक्षा एवं कुशिक्षा में उद्देश्य के आधार पर ही भेद किया जा सकता है। *(६) [[समस्या प्रणाली]] तथा [[प्रोजेक्ट प्रणाली]] से जो ज्ञान प्रदान किया जाता है, वह क्रमबद्ध एवं सुशृंखलित नहीं होता। (७) कोमल शिक्षा प्रणाली के कारण बालकों को वास्तविक जीवन जीने के लिए तैयार नहीं किया जाता। उन्हें एक कृत्रिम ख्याली दुनियाँ में रखा जाता है।
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