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==कृतित्व व सृजन की पृष्ठभूमि== कविवर श्री शंकर द्विवेदी की सृजनात्मक धरोहर अत्यंत समृद्धशाली है। चालीस वर्षों के अपने संक्षिप्त जीवनकाल में यद्यपि उनका [[सृजन]]-चक्र इतस्ततः बीस से पच्चीस वर्ष के अंतराल का ही रहा होगा। किन्तु अल्प काल में ही उन्होंने अनेक [[कालजयी]] [[काव्य | काव्यों]] का सृजन किया है। यह समय का फेर ही कहा जाएगा कि उनका अमूल्य कृतित्व अब तक प्रकाशित न हो सका। उनके आकस्मिक निधन से उपजी परिस्थितिवश उनका कृतित्व भी समय के अनिश्चित गह्वर में छिपा रहा। मरणोपरांत संकल्प प्रकाशन, [[आगरा]] द्वारा [['अन्ततः']] नामक एक गीत-संग्रह, प्रकाशित हुआ भी, जिसका विमोचन [[पद्मश्री]] [[गोपालदास नीरज]] के कर-कमलों से हुआ परन्तु इसे भी दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस कृति के प्रचार-प्रसार के प्रति उचित न्याय नहीं हुआ और यह प्रकाशित हो कर भी अप्रकाशित ही रही। श्रेष्ठ [[साहित्य]] का [[सृजन]] दैवीय अनुकम्पा के निमित्त है। [[कालचक्र]] के फेर से अनिश्चितता के अम्बुद, ज्योतिधर का आच्छादन भले ही कर लें, किन्तु इसका अस्तित्व क्षणिक ही होता है। वे न तो उसकी ज्योतिर्मयी [[रश्मि | रश्मियों]] को समेट सकते हैं और न ही उसके [[ताप]]-परिताप को बाँध पाते हैं। द्विवेदी जी का [[सृजन]]-पुंज भी ऐसे ही किसी अवसर की बाट जोह रहा है। शुभस्य शीघ्रम, शनैः-शनैः भानु का प्रभास इस अनिश्चित तमिस्र को रौंदता हुआ उदित हो रहा है: ------------------------------------------------- :'' यों समय के फेर से तो भानु भी- :'' बादलों ने बाँह में बाँधा सही। :'' किन्तु यह क्यों भूलते हो, ज्योतिधर- :'' ताप देने में कभी हारा नहीं।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [[शीष कटते हैं, कभी झुकते नहीं]] से उद्धृत) -------------------------------------------------- :'' वक्ष पर समकोणवत, आ तो गईं हैं बाँह- :'' एक पग उठकर जमे, है शेष इतनी देर। :'' चल पड़ा, तो यात्रा करके रहेगा पूर्ण- :'' सारथी पश्चिम दिशा तक, रौंदता अँधेर।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [[विश्व-गुरु के अकिंचन शिष्यत्व पर]] से उद्धृत) श्री द्विवेदी [[राष्ट्र | राष्ट्रीय]] व [[सांस्कृतिक]] चेतना के अमर गायक थे। उनके काव्य व वाणी दोनों ही से ओजस्विता के स्वर का उद्घोष होता था। उनकी ओजस्वी वाणी से अभिभूत हो कर [[राष्ट्रकवि]] [[सोहनलाल द्विवेदी]] ने उन्हें '''आधुनिक [[दिनकर]]''' कह कर संबोधित किया था। [[भारत]] के भूतपूर्व यशस्वी [[प्रधानमंत्री]] एवं उत्कृष्ट [[काव्य]]-स्रष्टा [[अटल बिहारी वाजपेयी]] भी स्व. द्विवेदी की [[काव्य]]-प्रतिभा के अनन्यतम प्रशंसकों में से एक थे। अपने अध्ययन काल से ही श्री द्विवेदी ने [[खड़ी बोली]] तथा [[ब्रजभाषा]] में [[काव्य]]-[[छंद]]-[[गीत]]-[[गीतिका | गीतिकाएँ]] इत्यादि का [[सृजन]] आरम्भ कर दिया था। [[साहित्य]]-सृजन में [[देश]]-[[काल]]-परिस्थिति के फलस्वरूप उत्पन्न गतिविधियाँ सदैव ही सर्जकों व कवियों के ध्यानाकर्षण का केंद्र होती हैं। श्री द्विवेदी का सर्जनात्मक उत्कर्ष एक ऐसे काल का [[साक्षी]] रहा है जब [[भारत]] को अनेक [[युद्ध | युद्धों]] का सामना करना पड़ा। सन [[१९६२]] में [[भारत-चीन युद्ध]], सन [[१९६५]] में [[भारत पाकिस्तान युद्ध]], सन [[१९६७]] में [[नाथूला]] [[दर्रे]] में पुनः [[भारत-चीन युद्ध]] तथा [[१९७१]] में एक बार फिर से [[भारत पाकिस्तान युद्ध]] की विभीषिकाएँ इस देश को आंदोलित-मथित करती रहीं। एक सत्यवीर राष्ट्रपुरुष व कवि के रूप में द्विवेदी जी की [[राष्ट्रवाद | राष्ट्रवादी]] चेतना का भी [[मंथन]] हुआ और उनके द्वारा इस काल में अनेक [[कालजयी]] रचनाओं की स्रष्टि हुई: ------------------------------------------------- :'' हिंस्र-पशुओं को ह्रदय का स्नेह दो, :'' यह तपोवन-वासियों का धर्म है। :'' हिंस्र-पशु, बाधा न डालें शांति में- :'' इसलिए, प्रतिबन्ध ही सत्कर्म है।। ------------------------------------------------- :'' आग, दहकी आग ही उपयुक्त है, :'' हिंस्र-पशुओं को डराने के लिए। :'' युद्ध, केवल युद्ध क्षमतावान है- :'' शांति का दीपक जलाने के लिए।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [['युद्ध, केवल युद्ध']] से उद्धृत) ------------------------------------------------- :'' हम मानवीय तत्वों के सच्चे साधक हैं, :'' है प्रबल बहुत सन्मान हमारा, सच मानो। :'' अपने नापाक इरादों पर संयम रख लो, :'' तुम काश्मीर के लिए न शम्सीरें तानो।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [['तुम काश्मीर के लिए न शमसीरें तानो']] से उद्धृत) [[काव्य]]-सृजन में [[भाव]] और [[चिंतन]] का वैविध्य शंकर द्विवेदी की विशिष्टता का परिचायक है। जहाँ उनके [[काव्य]] में [[राष्ट्र | राष्ट्रीय]] चेतना की अभिव्यक्ति है, वहीँ [[समकालीन]] [[राजनीति]] के प्रति भी वे संवेदनशील हैं। स्वार्थपूरित [[राजनीति]] की विद्रूपता और उसके फलस्वरूप उत्पन्न [[सामाजिक]] विषमता के प्रति उनका विप्लवकारी स्वर विद्रोह कर उठता है। विकृत [[राजनीति]] के प्रति [[कवि]]-धर्म का स्वनिर्वहन तथा [[राजनीति]] को सम्यक दर्पण दिखलाने का [[भागीरथी]]-प्रयास उनके काव्यावलोकन से स्वयं अनुभूत किया जा सकता है। [[सामाजिक]] वैषम्य के प्रति उनका आक्रोश और उससे उपजी [[कविता | कविताएँ]] उनके प्रगतिवादी चिंतन का प्रतीक हैं: ------------------------------------------------- :'' सिर्फ़ योजना बनीं, महज़ महलों में खुशियाँ लाईं, :'' कहीं फूस की कुटी, अभी तक महल नहीं बन पाईं।। ------------------------------------------------------------------ :'' तब कोई जय 'शंकर', फिर से [[कामायनी]] लिखेगा। :'' किन्तु पात्र का चयन, मात्र इतना सा भिन्न करेगा।। ------------------------------------------------------------------ :'' [[मनु]] होगा मज़दूर, ग़रीबी [[श्रद्धा]] बन जाएगी। :'' शासक पर शासित की घोर अश्रद्धा हो जाएगी।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [[तब कोई जय 'शंकर'...]] से उद्धृत) ------------------------------------------------------------------ :'' तेरी कला और वैभव ने तब से अब तक, :'' केवल पूँजीवादी स्वर आबाद किया है। :'' ताजमहल! सच मान, झूठ कुछ नहीं कि तूने- :'' पाक मुहब्बत का दामन नापाक किया है।। ------------------------------------------------------------------ :'' तेरे निर्माता ने अपने अधिकारों का- :'' दुरुपयोग जो किया विवशता का श्रमिकों की। :'' वह अपराध किया है अनुचित लाभ उठा कर, :'' क्रमागता पीढ़ियाँ क्षमा कर नहीं सकेंगी।। :'' कर कटवाते समय उसे यह ध्यान नहीं था- :'' कालान्तर में कला परिष्कृत प्रौढ़ बनेगी। :'' क्योंकि विकास धर्म है मानव के जीवन का, :'' फलतः सारी स्रष्टि उसे निर्बुद्धि कहेगी।। ---------------------------------------- :'' जिस दिन मेरी आँखों से देखेगा कोई- :'' उस दिन तेरा सहज सत्य प्रतिभासित होगा। :'' जिस दिन भूमिसात् होंगी तेरी प्राचीरें, :'' उस दिन तेरा सही स्वरूप प्रकाशित होगा।। :'' मैं क्या था, राजसी दम्भ या पागलपन का- :'' शोषण और रक्त से पनपा अनाचार था। :'' तृण से भी था नगण्य, जिस कारण पुजा हुआ था, :'' कलाकार की सहन शक्ति- 'श्रम' का प्रचार था।। ([[कालजयी]] [[कविता]] [['ताजमहल']] से उद्धृत) --------------------------------------- [[नारी]]-विमर्श के अंतर्गत उनका चिन्तन एक ओर तो उसकी [[वेदना]], [[त्याग]], [[समर्पण]] के चित्र खींचता है: :'' गीली पलकें ‘क्षमयस्व’ भाव- :'' लेकिन श्वासों में भरे कपट। :'' कुछ और कहे इससे पहले- :'' छू लिये पतित ने चरण झपट।। ---------------------------------------- :'' नारीत्व पगा है करुणा में, :'' हिलकी भर कर रोया केवल। :'' ‘राजू’ पर उमगा स्नेह देख, :'' गोवध-घर समझ लिया देवल।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [['गाँधी'-आश्रम]] से उद्धृत) --------------------------------------- वहीँ दूसरी ओर वे उसे 'स्व-अस्तित्व' की रक्षार्थ, [[संघर्ष]] के लिए उठ खड़ी होने वाली प्रतिमूर्ति के रूप में भी चित्रित करता है: :'' मेरे सिरजनहार तुम्हीं हो, अनावरित तन के अधिकारी। :'' तुमने ही लाखों कुटियों के दीप बुझाए हैं हँस-हँस कर।। :'' अपने घर कुबेर, पर मेरे द्वारे पर जनम के भिखारी। :'' तुमको है धिक्कार! आज अभिशाप दे रही हूँ रो-धो कर।। --------------------------------------- :'' तुम युग के इतिहास बदल जाने पर भी संतप्त रहोगे। :'' अंतर्द्वंद्व प्रपीड़ित तन पर संघर्षों के घाव रहेंगे।। :'' प्रकृति महाकाली के कर की; नारी ही करवाल बनेगी। :'' कुछ विध्वंस-प्रयोजक तुम में से ही उस पर धार धरेंगे।। -- ([[कालजयी]] [[कविता]] [['निर्मला' की पाती]] से उद्धृत) --------------------------------------- [[श्रृंगार | श्रृंगारिक]] [[सृजन]] में वे [[संयोग]]-[[वियोग]] द्वय के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में विद्यमान हैं। [[अनुराग]]-[[राग]]-विराग की त्रयी उनके [[गीत | गीतों]] में स्पष्ट परिलक्षित होती है। उनके कृतित्व में जीवन का स्पंदन तथा द्वंद्व सम-भाव से उपस्थित है। यह [[अक्षर]]-सम्पदा सचमुच [[अक्षर]]-सम्पदा ही है। श्री द्विवेदी में गहन-सौन्दर्य-बोध विद्यमान था, उनके कृतित्व से भी इसका बोध होता है: :'' इस ताल के किनारे- :'' कचनार यों पुकारे। :'' आ पत्थरों की शैय्या- :'' उपधान के सहारे। :'' तू लेट जा, मैं तुझको- :'' कुछ इस तरह दुलारूँ- :'' मन चन्द्रमा को चूमे, :'' आकाश को निहारे।। -- ([[हम-तुम एक डाल के पंछी]] [[गीत]]-संग्रह से उद्धृत) --------------------------------------- [[नारी]]-सौन्दर्य के प्रति उनके चिन्तन में दिव्य-चेतना दिखाई देती है। वे [[अनुराग | अनुरागी]] हैं, तो [[वैराग्य | वैरागी]] भी हैं: :'' मुझको तो ऐसा लगता है, तुममें-मुझमें भेद न कोई। :'' जैसे-मैं हूँ भाव, और तुम हो मेरी अभिव्यक्ति सुहानी।। --------------------------------------- :'' भोग है भाग्य का और कुछ भी नहीं, हम मिले भी तो यों छूटने के लिए। :'' ये जुड़ेंगे किसी ज़िन्दगी से कहाँ? प्राण हैं आज से टूटने के लिए।। --------------------------------------- :'' सुख का शुभागमन ही नहीं, दुःख का समापन भी नहीं। :'' फिर क्यों मिला इतना प्रबल व्यामोह जीवन के लिए।। :'' आलोक की कोई किरण, :'' देती नहीं मुझको शरण। :'' तम जो विरासत में मिला, :'' धरता रहा अभिनव चरण। :'' निर्वेद-दीपक-ज्योति पर, :'' संकल्प-शलभ मिटा दिए। :'' निष्फल प्रतीक्षा ने, मरण- :'' के साज़ सकल जुटा दिए। :'' ऋत् का निदर्शन ही नहीं, मत का समर्थन भी नहीं। :'' फिर क्यों मिली इतनी ललक, दो गीत सर्जन के लिए।। -- ([[हम-तुम एक डाल के पंछी]] [[गीत]]-संग्रह से उद्धृत) --------------------------------------- [[ब्रजभाषा]] सृजित उनके [[काव्य]] में [[ग्रामीण]] परिवेश की मानसिक संरचना एकदम [[संत | संतों]] की वाणी के समान सुनाई पड़ती है: :'' नित साँझ घिरे, लौटें गैंया, :'' बछरा रँभाय, पय-पान करैं। :'' कुलबधू जोरि कर दीप धरैं, :'' तुलसी मैया खलिहान भरैं।। --------------------------------------- :'' या दुनियाँ की राम-कहानी, :'' उतनी, जितनी हमनैं जानी- :'' करुना भरी रे, मेरे यार! :'' काल के कर कौ खिलौना संसार।। -- ([[बरसि पिया के देस]] [[ब्रजभाषा]]-[[काव्य]]-संग्रह से उद्धृत) --------------------------------------- [[ब्रज]]-रज में देहावतरित श्री द्विवेदी के [[ब्रजभाषा]]-[[काव्य]] में जहाँ एक ओर वहाँ की [[सांस्कृतिक]] छटा का आभास होता है वहीँ दूसरी ओर [[आराध्य]] [[श्रीकृष्ण]] के प्रति उनकी अटूट आस्था के दर्शन किये जा सकते हैं। [[ब्रज]] की प्रचलित लोकधुनों पर आधारित उनके [[गीत | गीतों]] का [[सृजन]] व उनका कंठ-माधुर्य [[कवि सम्मेलन|कवि सम्मेलनों]] में बरबस ही ध्यानाकर्षण का केंद्र बन जाता था: :'' सोहत करील-कुञ्ज, गुंजत मधुप-पुंज, :'' मंद-मंद, चंद मुस्कानि छिटकाबतौ। :'' भाबतौ न भाबतौ, पै गाबतौ सुगान कान्ह, :'' आपने करन लट आनि सुरझाबतौ। :'' टेरतौ भलैं न पैन, फेरतौ सलौने नैंन, :'' सैन न चलाबतौ, पै नेह सरसाबतौ। :'' ‘संकर’ मनाबतौ, न बैठतौ कदम तर, :'' मान छाँड़ि देती, नैंकु बाँसुरी बजाबतौ।। -- ([[बरसि पिया के देस]] [[ब्रजभाषा]]-[[काव्य]]-संग्रह से उद्धृत) --------------------------------------- उनका [[शिल्प (साहित्य)]] एवं [[भाव]]-सौन्दर्य उत्कृष्ट कोटि का है। [[छंद | छंदानुशासन]], [[काव्यालंकार | काव्यालंकरण]], लयात्मकता, गेयता, [[नाद]]-सौन्दर्य, आत्माभिव्यक्ति आदि अनेक [[काव्यशास्त्र | काव्यशास्त्रीय]] गुण उनके [[सृजन]] के प्रांगण में स्पष्ट गोचर होते हैं। [[शब्द]]-[[साधना]] तो अप्रतिम है। उनके काव्य का अध्ययन स्वयं इसका [[साक्ष्य]] प्रस्तुत करता है। कवि द्विवेदी को यदि [[शब्द]]-शिल्पी कहा जाए तो [[अतिशयोक्ति]] न होगी।
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