सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
स्वामी सोमदेव
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== काँग्रेस अधिवेशन में== स्वामी जी अंग्रेजी भाषा एवं शास्त्रों के अच्छे जानकार थे। उनकी असाधारण योग्यता के कारण ही उन्हें [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|अखिल भारतीय कांग्रेस]] का प्रतिनिधि चुना गया था। [[आगरा]] की आर्यमित्र-सभा के वार्षिकोत्सव पर उनका व्याख्यान सुनकर [[राजा महेन्द्रप्रताप]] अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया। वे एक निर्भीक वक्ता थे। राम प्रसाद बिस्मिल ने उन्हें सन् 1913 में पहली बार शाहजहाँपुर में सुना था। उन दिनों वे [[बरेली]] में निवास करते थे और वहीं से शाहजहाँपुर व्याख्यान देने पधारे थे। सोमदेव का शरीर काफी दुबला-पतला था किन्तु उनकी वाणी बहुत बुलन्द व इतनी स्पष्ठ थी कि बिना माइक के बोलने पर भी तीन-चार फर्लांग की दूरी से बिल्कुल साफ सुनायी देती थी। उन्हें एक अजीब रोग हो गया था। जब कभी शौच जाते, कभी दो छटांक, कभी चार छटांक और कभी कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। उन्हें [[बवासीर]] नहीं थी परन्तु वे ऐसा बताते थे कि योग-क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत सड़ गयी। अतएव चिकित्सकों ने उनका पेट चीरकर आँत काट दी थी। तभी से उन्हें मलद्वार से रक्त जाने का भयंकर रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्यों व डॉक्टरों से इलाज भी कराया परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। सन् 1915 में कुछ लोगों ने उनसे अनुरोध किया कि [[शाहजहाँपुर]] की जलवायु में कठिन से कठिन रोग समाप्त हो जाते हैं। तभी से वे आर्यसमाज मन्दिर शाहजहाँपुर में ही निवास करने लगे। बिस्मिल ने उनकी सेवा-सुश्रूषा में अपना काफी समय दिया।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)