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== हिन्दी साहित्य में हास्य == वर्तमान काल में हास्य के विषयों और उनकी अभिव्यक्ति करने की शैलियों का बहुत विस्तार हुआ है। इस युग में पद्य के साथ ही गद्य की भी अनेक विधाओं का विकास हुआ है। प्रमुख हैं नाटक तथा एकांकी, उपन्यास तथा कहानियाँ, एवं निबंध। इन सभी विधाओं में हास्यरस के अनुकूल प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा गया और लिखा जा रहा है। प्रतिभाशाली लेखकों ने पद्य के साथ ही गद्य की विविध विधाओं में भी अपनी हास्यरसवर्धिनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। इस युग के प्रारंभिक दिनों के सर्वाधिक यशस्वी साहित्यकार हैं [[भरतेन्दु हरिश्चन्द्र|भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र]]। इनके नाटकों में विशुद्ध हास्यरस कम, वाग्वैदग्ध्य कुछ अधिक और उपहास पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। "[[वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति]]", "[[अंधेर नगरी]]" आदि उनकी हास्य कृतियाँ हैं। उनका "चूरन का लटका" प्रसिद्ध है। उनके ही युग के [[लाला श्रीनिवास दास]], [[प्रतापनारायण मिश्र]], [[राधाकृष्णदास]], [[प्रेमघन]], [[बालकृष्ण भट्ट]] आदि ने भी हास्य की रचनाएँ की हैं। प्रतापनारायण मिश्र ने "कलिकौतुक रूपक" नामक सुंदर प्रहसन लिखा है। "बुढ़ापा" नामक उनकी कविता शुद्ध हास्य की उत्तम कृति है। उस समय अंग्रेजी राज्य अपने गौरव पर था जिसकी प्रत्यक्ष आलोचना खतरे से खाली नहीं थी। अतएव साहित्यकारों ने, विशेषत: व्यंग्य और उपहास का मार्ग ही पकड़ था और स्यापा, हजो, वक्रोक्ति, व्यंगोक्ति आदि के माध्यम से सुधारवादी सामाजिक चेतना जगाने का प्रयत्न किया था। भारतेंदुकाल के बाद महावीरप्रसाद द्विवेदी काल आया जिसने हास्य के विषयों और उनकी अभिव्यंजना प्रणालियों का कुद और अधिक परिष्कार एवं विस्तार किया। नाटकों में केवल हास्य का उद्देश्य लेकर मुख्य कथा के साथ जो एक अंतर्कथा या उपकथा (विशेषतः [[पारसी थिएटर|पारसी थिएट्रिकल कंपनियों]] के प्रभाव से) चला करती थी वह [[द्विवेदी युग|द्विवेदीकाल]] में प्रायः समाप्त हो गई और हास्य के उद्रेक के लिए विषय अनिवार्य न रह गया। काव्य में "सरगौ नरक ठेकाना नाहिं" सदृश रचनाएँ [[सरस्वती पत्रिका|सरस्वती]] आदि पत्रिकाओं में सामने आई। उस युग के बावू [[बालमुकुंद गुप्त]] और पं. [[जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी]] हास्यरस के अच्छे लेखक थे। प्रथम ने "भाषा की अनस्थिरता" नामक अपनी लेखमाला "आत्माराम" नाम से लिखी और दूसरे सज्जन ने "निरंकुशता-निदर्शन" नामक लेखमाला "मनसाराम" नाम से। दोनों ने इन मालाओं में द्विवेदी जी से टक्कर ली है और उनकी इस नोकझोंक की चर्चा साहित्यिकों के बीच बहुत दिनों तक रही। बालमुकुंद गुप्त जी का शिवशंभु का चिट्ठा, [[चंद्रधर शर्मा गुलेरी]] का कछुवा धर्म, [[मिश्रबंधु]] और [[बदरीनाथ भट्ट]] जी के अनेक नाटक, श्री [[हरिशंकर शर्मा]] के निबंध, नाटक आदि, [[गंगा प्रसाद श्रीवास्तव]] और [[पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'|उग्र]] जी के अनेक प्रहसन और अनेक कहानियाँ, अपने अपने समय में जनसाधारण में खूब समादृत हुई। जी. पी. श्रीवास्तव में उलटफेर, लंबी दाढ़ी आदि लिखकर हास्यरस के क्षेत्र में धूम मचा दी थी, यद्यपि उनका हास्य उथला उथला सा ही रहा है। [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'|निराला]] जी ने सुंदर व्यंगात्मक रचनाएँ लिखी हैं और उनके कुल्ली भाठ, चतुरी चमार, सुकुल की बीबी, बिल्लेसुर बकरिहा, कुकूरमुत्ता आदि पर्याप्त प्रसिद्ध है। पं. [[विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक]] निश्चय ही 'विजयानंद दुबे की चिट्ठियाँ' आदि लिखकर इस क्षेत्र में भी पर्याप्त प्रसिद्धिप्राप्त हैं। [[शिवपूजन सहाय]] और [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ने "हास्यरस के साहित्य की अच्छी श्रीवृद्धि की है। [[अन्नपूर्णानंद वर्मा]] को हम हास्यरस का ही विशेष लेखक कह सकते हैं। उनके "महाकवि चच्चा", "मेरी हज़ामत," "मगन रहु चोला", मंगल मोद", "मन मयूर" सभी सुरुचिपूर्ण हैं। वर्तमान काल में [[उपेंद्रनाथ अश्क]] ने "पर्दा उठाओ, परदा गिराओ" आदि कई नई सूझवाले एकांकी लिखे हैं। डॉ॰ [[रामकुमार वर्मा]] का एकांकी संग्रह "रिमझिम" इस क्षेत्र में मील का पत्थर माना गया है। उन्होंने स्मित हास्य के अच्छे नमूने दिए हैं। देवराज दिनेश, उदयशंकर भट्ट, भगवतीचरण वर्मा, प्रभाकर माचवे, जयनाथ नलिन, बेढब बनारसी, कांतानाथ चोंच," भैया जी बनारसी, [[गोपालप्रसाद व्यास]], [[काका हाथरसी]], आदि अनेक सज्जनों ने अनेक विधाओं में रचनाएँ की हैं और हास्यरस के साहित्य को खूब समृद्ध किया है। इनमें से अनेक लेखकों की अनेक कृतियों ने अच्छी प्रशंसा पाई है। [[भगवतीचरण वर्मा]] का "अपने खिलौने" हास्यरस के उपन्यासों में विशिष्ट स्थान रखता है। [[यशपाल]] का "चक्कर क्लब" व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध है। [[कृष्णचंद्र]] ने "एक गधे की आत्मकथा" आदि लिखकर व्यंग्य लेखकों में यशस्विता प्राप्त की है। गंगाधर शुक्ल का "सुबह होती है शाम होती है" अपनी निराली विधा रखता है। [[राहुल सांकृत्यायन]], [[सेठ गोविंद दास]], श्रीनारायण चतुर्वेदी, अमृतलाल नागर, डॉ॰ बरसानेलाल जी, वासुदेव गोस्वामी, बेधड़क जी, विप्र जी, भारतभूषण अग्रवाल आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं जिन्होंने किसी न किसी रूप में साहित्य के इस उपादेय अंग की समृद्धि की है। अन्य भाषाओं की कई विशिष्ट कृतियों के अनुवाद भी हिंदी में हो चुके हैं। केलकर के "सुभाषित आणि विनोद" नामक गवेषणापूर्ण मराठी ग्रंथ के अनुवाद के अतिरिक्त मोलिये के नाटकों का, "गुलिवर्स ट्रैवेल्स" का, "डान क्विकज़ोट" का, सरशार के "फिसानए आज़ाद" का, रवींद्रनाथ टैगोर के नाट्यकौतुक का, परशुराम, अज़ीमबेग चग़ताई आदि की कहानियों का, अनुवाद हिंदी में उपलब्ध है।
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