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== सममिति (Symmetry) == क्रिस्टलों के फलक, सममिति की निश्चत योजनाओं के अनुसार व्यवस्थित रहते हैं। कुछ आधार चिन्हों, का जिन्हें सममिति के मूल अवयव (elements of symmerty) कहते हैं, अध्ययन किया जाता है। ये अवयव निम्नलिखित हैं : :(१) सममिति समतल, :(२) सममिति, तथा :(३) सममिति केंद्र। यदि क्रिस्टल में एक सममिति समतल उपस्थित है, तो वह क्रिस्टल को दो समरूप तथा बराबर भागों में इस प्रकार विभाजित करता है कि एक हिस्सा दूसरे का प्रतिबिंब होता है। यदि क्रिस्टल में एक सममिति अक्ष है, जो उस अक्ष पर क्रिस्टल को घुमाने से, एक पूरे चक्र में, क्रिस्टल का एक ही निर्दिष्ट रूप एक बार से अधिक, दो, तीन, चार बार दिखलाई पड़ता है। इस दृष्टि से सममिति अक्ष को द्विकोणीय (digonal), त्रिकोणीय (trigonal), चतुष्कोणीय (tetragonal), या षट्कोणीय (hexagonal) सममिति अक्ष कहते हैं। उपर्युक्त सममिति अक्षों के लिये क्रिस्टल को क्रमश: 180 डिग्री, 120 डिग्री, 90 डिग्री और 60 डिग्री घुमाना पड़ता है। षट्कोणीय सममिति अक्ष से अधिक की अक्षीय सममिति क्रिस्टलों में संभव नहीं है। और न पंचकोणीय अक्षीय सममिति ही संभव है। यदि क्रिस्टल में सममिति केंद्र उपस्थित है, तो क्रिस्टल के एक भाग में विद्यमान एक कोनिया (Coign), एक कोर या एक फलक की संगत (corresponding) कोनिया, कोर या फलक क्रिस्टल के विपरीत भाग में भी विद्यमान होता है। किसी क्रिस्टल में सममिति अवयव और उनके गुणों को जानने के लिये क्रिस्टल को समरूप फलकों के असमान विकास से होनेवाली अनियमितताओं से, जैसा कि प्रकृति में साधारणत: होता है, मुक्त कल्पित किया जाता है। केवल ज्यामितीय सममिति की दशा में सममिति केंद्र या एक समतल के विपरीत पाश्र्व में विद्यमान कोनिया, कोर या फलक, समान दूरी पर स्थित होने चाहिए। इसमें विपरीत फलक भी एक ही आकार और रूप के होते हैं। क्रिस्टल संरचनात्मक सममिति में अंतराफलक कोण की सममिति ही निश्चयात्मक अवयव है, फलकों का विस्तार और आकृति प्राकृतिक विरूपण के कारण महत्व नहीं रखते हैं। क्रिस्टल में विरूपण का कारण विलायकों की शुद्धता या क्रिस्टल की वृद्धि गति, ताप या संपीडन में प्रतिकूलता है। यही तथ्य क्रिस्टल के विशेष रूप (habit) को निश्चित करते हैं। क्रिस्टल का विशेष रूप उपस्थित रूपों तथा प्रत्येक रूप के फलकों के आपेक्षिक विस्तार के लक्षणों के योग का ही परिणाम है। क्रिस्टल में विद्यमान प्रधान फलक समष्टियों, अथवा क्रिस्टल में एक या दो दिशाओं में अधिक विकास के कारण बननेवाले प्रिज्मीय और सपाट रूपों के लिये प्रयुक्त शब्दों, के साथ ""विशेष रूप"" (habit) शब्द का प्रयोग किया जाता है। क्रिस्टल की सममिति की विशेषताओं को पूर्ण रूप से अध्ययन करके प्राचीन कार्यकर्ताओं ने सममिति का नियम बनाया। यह सूत्र या नियम इस प्रकार है : एक क्रिस्टल के फलक सममिति के निश्चित अवयव के अनुसार स्थित होते हैं। उस क्रिस्टल के लिये फलकों की स्थिति निश्चत रहती है और इसी पर उसका बाह्यरूप तथा भौतिक गुण निर्भर करता है। पहले कार्यकर्ताओं ने भी यह ज्ञात किया था कि एक पदार्थ के क्रिस्टल चाहे कितना ही विभिन्न रूप दिखलाएँ, पर उनके संगत अंतरफलक कोण की स्थिरता (Law of Constancy of Interfacial Angnles) का मूल सूत्र है।
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