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== सफवी युग == [[तैमूरलंग|तैमूर]] सन् 1405 ई. में मरा और उसके बाद उसका विस्तृत साम्राज्य विभिन्न सरदारों में बँट गया, जो आपस में युद्ध करते रहते थे। ऐसी परिस्थिति एक शती तक रही, जिसके अनंतर सफवी वंश का उदय हुआ। सफवियों ने पूरे ईरान पर शासन किया। इनसे पहले पूरे ईरान पर किसी वंश ने शासन नहीं किया था। इनके काल में ईरान ने बड़ी उन्नति की और इन्हीं के समय से [[शिया इस्लाम|शीआ धर्म]] ईरान में अब तक चला आता है। इस युग के कवियों में [[हातिफी जामी]] है, जो प्रसिद्ध कवि [[जामी]] का भांजा था। उसने 'लैली व मजनूँ' तथा 'खुसरू व शीरीं' नामक मसनवियाँ तथा एक अन्य युद्ध काव्य 'तैमूरनामा' भी लिखा है, जिसमें तैमूर की विजयों का वर्णन है। [[हकीम अबुल कासिम फिरदौसी तुसी|फिरदौसी]] की बहुतों ने नकल की है पर उन सब में तैमूरनामा को अच्छी सफलता मिली। हातिफी का समकालीन कवि [[फ़िगानी]] था। यह पहले सुलतान हुसेन के दरबार में था, पर द्वेषियों के कारण तव्रेज चला गया, जहाँ इसका सम्मान हुआ और इसे "बाबाए शुअरा" (कवियों का पितामह) की पदवी मिली। फ़िग़ानी की विशेषता यह है कि इससे अपने शेरों में नई नई उपमाएँ तथा शैलियाँ प्रयुक्त कीं। ग़ज़ल में भी अच्छी कुशलता रखता था, जिससे यह 'छोटा हाफिज' कहलाता था। सन् 1516 या 19 ई. में इसकी मृत्य हुई। जामी का शिष्य [[आसिफी]] अच्छा [[क़सीदा|कसीदागो]] कवि था। इसके समसामयिक पहली [[शीराज़ी]] ने [[शाह इस्माइल सफवी]] की प्रशंसा में बड़े भव्य कसीदे कहे हैं। इसकी ख्याति का आधार मसनवी "सेहरे जलाल" है। इसने एक मसनवी "शमअ व परवाना" भी लिखी है, जिससे उसकी [[सूफ़ीवाद|सूफी]] रुचि प्रकट होती है। अहली का सकालीन हिलाली था, जिसने एक दीवान, एक मसनवी "शाहो गदा" और एक काव्य "सिफातुल्" स्मारक रूप में छोड़ी है। सन् 1522 ई. में यह उजबक तुर्क बादशाह के हाथों, जो [[शिया इस्लाम|शीआ धर्म]] का विरोधी था, मारा गया। इसी समय का दूसरा कवि कासिमी था, जिसने एक [[शाहनामा]] प्रस्तुत किया। इसमें इसने [[शाह इस्माइल]] की विजयों का वर्णन किया है। [[मुहताशिम काशी]] इस काल का सबसे बड़ा मर्सिया कहनेवाला कवि है। [[शाह अब्बास प्रथम]], [[सफ़वी वंश|सफवी वंश]] का सबसे बड़ा शासक हुआ जो सन् 1587 ई. में गद्दी पर बैठा। वह कवियों तथा साहित्यकारों का, आश्रयदाता था। इनमें शानी तेहरानी था, जिसे उसने सोने से तौलवा दिया था। इनमें शानी तेहरानी था, जिसे उसने सोने से तौलवा दिया था। शाह अब्बास के हकीम "शिफाई" ने मसनवियाँ तथा कसीदे लिखे हैं। "जुलाली ख्वानसारी" सन् 1615 या 16 में मरा। यह शाह अब्बास के काल का प्रसिद्ध मसनवी रचयिता था। इसने सात मसनवियाँ लिखीं, जिन्हें "सुबअ सैयारा" (सात नक्षत्र) कहते हैं। सफवी शाहों ने शीआ मत के प्रचार में बहुत ध्यान दिया था जिससे अन्य देशों के शीआ विद्वान् इनके समय में ईरान आकर बस गए। इनमें [[बहाउद्दीन आमिली]] का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसने [[शाह अब्बास]] के आदेश पर शीआ नियमों पर "जामए अब्बासी" नामक पुसतक लिखी। शाह अब्बास की विजयों के वर्णन में "कमाली सब्ज़वारी" ने एक शाहनामा लिखा। [[इसंकदर बेग मुंशी]] ने शाह अब्बास की जीवनी "तारीखे जहाँआराए अब्बासी" में लिखी है। इस युग में [[हिंदुस्तान]] फारसी साहित्य का अच्छा केंद्र बन गया था। जब ईरान में सफवी वंश शासन कर रहा था, हिंदुस्तान में [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल वंश]] का साम्राज्य था, जो विद्या तथा साहित्य का बड़ा आश्रयदाता था। मुगलों के पास जो ऐश्वर्य तथा धन था वह ईरान के सफविरों के पास नहीं था, इससे ईरान के बहुत से कवि अपना देश त्याग कर भारत चले आए। [[बाबर]] ने प्रसिद्ध इतिहासकार [[मीर खोद]] के पौत्र खोद मीर को हिंदुस्तान बुलवाया, जहाँ इसने अपना प्रसिद्ध इतिहास "हबीबुसियर" प्रस्तुत किया। इसमें प्राचीनतम काल से आरंभ कर शाह इस्माइल की मृत्यु अर्थात् सन् 1524 ई. तक का संसार का इतिहास दिया गया है। इसकी अन्य रचनाएँ "खुलासतुल् अखबार", "दस्तूहल् वज़रार" तथा "हुमायूँनामा" हैं। [[अकबर]] की आज्ञा से "तारीखे अलफी" लिखी गई, जिसमें इसलाम के पैंगबर की मृत्यु के अनंतर एक सहस्र वर्ष तक का इतिहास आया है। अकबर कवियों का बड़ा सत्कार करता था। सुश्फिकी बुखाराई, जो सन् 1588 ई. में मरा, [[ग़ज़ल|गजल]] का सुकवि था। [[हुसेन सनाई मशहदी]] मसनवी लेखक था। ये दोनों अकबर के दरबार में थे, किंतु अकबरी दरबार का सबसे बड़ा कवि [[जमालुद्दीन ऊर्फी]] था। यह [[शीराज़|शीराज]] में पैदा हुआ था पर हिंदुस्तान चला आया था। उर्फी के कसीदे प्रसिद्ध हैं, जिनमें कल्पना की समर्थ उड़ानें हैं। उर्फी सन् 1590 ई. मरा। फैजी ने निज़ामी के "लैली व मजनूँ" की चाल पर एक हिंदी प्रेमगाथा को "नलदमन" के नाम से कविताबद्ध किया है। नलदमन मूलत: [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में [[नलदयमंती]] है। इसी काल में [[जुहूरी तेहरानी]] ने हाफिज के ढंग पर साकीनामा मसनवी लिखी है, जिसकी अच्छी प्रसिद्धि है। अकबर का पुत्र [[जहाँगीर]] भी विद्वानों तथा गुणियों का आश्रयदाता था और इसने प्रसिद्ध ईरानी कवि कलीम आमिली को अपने दरबार का मिलिकुश्शोअरा (कवियों का राजा) नियत किया था। तालिब की कविता का गुण "नुजरते तश्बीह" तथा "लुत्फ़े इस्तेआर" अर्थात् उपमा तथा उत्प्रेक्षा से प्रकट है। "सायुब" जो वस्तुत: तब्रेज़ के एक परिवार से संबंधित था हिंदुस्तान तथा ईरान दोनों देशों के साहित्येतिहास से संबद्ध है। [[सायब]], जामी के बाद ईरान का सर्वश्रेष्ठ कवि है। यह [[शाह जहाँ|शाहजहाँ]] के दरबार का कवि था। हिंदुस्तान से लौटकर ईरान चला गया, जहाँ [[शाह अब्बास द्वितीय]] ने उसे मलिकुश्शुअरा की पदवी दी। सायब सार 1677 ई. में मरा। "फैयाजी" उसका समकालीन था। उसने अपने कसीदों द्वारा शीआ इमामों की प्रशंसा की और हज़रत हसन व हुसेन का [[मरसिया]] कहा है। सफवी युग के अंतकाल में अबदुल् अल्नजात इस्फहानी हुआ है, जिसकी मृत्यु सन् 1714 ई. में हुई थी। इसकी लेखनशैली घटिया तथा बाजारू है परंतु इसकी मसनवी "गुले कुश्ती" इस दोष से मुक्त है और यह अत्यंत लोकप्रिय हुई। प्राय: इसी काल में शेख अली हजीं कवि हुए, जो ईरान से हिंदुस्तान चले आए थे। प्राचीन परिपाटी के समर्थ कवियों में इनकी गणना है। इन्होंने सात मसनवियाँ तथा चार दीवान लिखे और गद्य में "तजकिरतुल् मुआसिरीन" लिखी। इसमें अपने समय के कवियों तथा विद्वानों का वृत्त दिया है और इस कारण यह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। अपने व्यक्तगत वृत्तांत को "तजकिरातुल्अहवाल" में लिखा है। यह [[वाराणसी|बनारस]] में सन् 1766 ई. में मरे। सफवियों के युग की समाप्ति पर जब तक [[क़ाचार वंश]] का प्रभुत्व अच्छी प्रकार स्थापित नहीं हुआ, ईरान में शासन की अस्थिरता का काल रहा। इस काल में एक बड़े साहित्यिक व्यक्तित्व का दर्शन होता है, जो [[लुत्फ अली आज़र]] है। आज़र तुर्की क़बीला शामलू में से थे और इस्फहान में पैदा हुए। इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना "आतिशकदा" है, जो सन् 1860-66 ई. में लिखी गई। इसमें आठ सौ से अधिक कवियों का वृत्त दिया गया है। आज़र का एक दीवान भी है तथा एक मसनवी "यूसुफो जुलेखा" भी इन्होंने लिखी है।
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