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===हिमालय-पार का अभियान=== इस सारे वक़्त के दौरान डोगरा सेना का एक बहुत बड़ा हिस्सा उत्तरी हिमालय की पहाड़ियों पर चढाई में जुटी हुई थी। [[किश्तवाड़]] के जागीरदार, सेनापति ज़ोरावर सिंह की अघुआई में डोगरा सेना ने 1835 में [[कारगिल|करगिल]] और सूरु घाटी, और 1836 से 1840 के बीच बाकी के [[लद्दाख़]] और [[बल्तिस्तान]] पर कब्ज़ा कर लिया। लद्दाख़ और उत्तरी हिमालय में डोगराओं की बढ़ती ताक़त से चिंतित हो कर [[कश्मीर]] के सिख सूबेदार, मियान सिंह ने [[कुँवर नौनिहाल सिंह]] को ज़ोरावर सिंह और डोगराओं की सैन्य आभियानों की ख़बर से आग़ाह कर दिया। डोगराओं के इन क़ामयाब अभियानों ने कश्मीर और गिल्गिट में तवालद सिख फ़ौज को अभित्रस्त व चौकन्ना कर दिया था। ताकी बात और ना बिगड़ जाए, इस लिये ज़ोरावर ने सेना का रुख़ पूर्व में [[तिब्बत]] की ओर मोड़ दिया। मई 1841 में ज़ोरावर सिंह की सेना ने, 5000 डोगरा सिपाहियों, एवं किश्तवाड़ी, लद्दाख़ी और बाल्तीयों की सहायता से लैस, कुल 7000 फ़ौजियों की ताक़त के साथ तिब्बत पर चढ़ाई कर दी। ताब्बतीयों द्वारा किये गए सारे प्रिरोधों, आक्षेपों और बाधाओं के परास्त करते हुए सेना तीन गुठों में पूर्व की ओर तब्बती ज़मीन में बढ़ती रही। अंत्यतः उन्होंने तकलाकोट में अपना डेरा लगाया, पवित्र [[मानसरोवर]] के पस, सितम्बर 1841 में। इस दौरान वे भारतीय सीमांचलों से दूर, तिब्बती भूमी के 450 मील भीतर प्रवेष कर चुके थे। परंतू, भीशण तिब्बती सर्दकाल के आग़ास के पश्चात डोगरा सेना भीशण ठंड और सहूलियतों के आभाव के कारण, ज़ोरावर सिंह की पूर्वनिर्देशित प्रबंध के बावजूद, एक-एक-कर गिरने लगी। जम्मू, कश्मीर, लद्दाख़ और बल्तिस्तानी मूल की सेना के लिये उचित प्रबंधों के आभाव में तब्बत की "हड्डियां जमा देने वाली ठंड" को सह पाना बहुत मुश्किल हो गया था। ऐसा ज्ञात है की कईयों ने खुद को गर्म रखने की नाक़ामयाब कोशिश में सेना के असला और बारूद को भी जला दिया था। भीशण ठंड एवं किराने और असला के आभाव के कारण कमज़ोर पड़ चुकी डोगरा सेना को 12 दिसम्बर 1841 को तिब्बती सेना के हाथों मात झेलनी पड़ी। इस अभियान में जो जीवित बच गए थे, वे दक्षिण दिशा की ओर बढ़ कर हिमालय पार कर ब्रिटिश-साशित इलाक़े में पहुंच गए। राजा गुलाब सिंह, जो उस समय अंग्ल-सिख युद्ध का नेत्रित्व कर रहे थे, को इस दुर्घटना की जानारी हेन्री लौरेन्स ने दिय था। डोगरा घुसपैठ को परास्त करने के बाद आगे बढ़ रही तब्बती सेना ने लद्दाख़ पर हमला कर दाया, परंतू इस बार डोगराओं ने उन्हें '''[[चुशूल की लड़ाई]]''' में हरा दिया। अंत्यतः [[लद्दाख़]] और [[तिब्बत]] के बीच की सीमा को चूशूल समझौते द्वार तय कर दिया गया।
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