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=== दिवेर-छापली का युुद्ध === {{मुख्य|दिवेर-छापली का युद्ध}} [[चित्र:Rana pratap Birla mandir 6 dec 2009 (43).JPG|349x349px|thumb|left|[[लक्ष्मी नारायण मंदिर, दिल्ली|बिरला मंदिर, दिल्ली]] में महाराणा प्रताप का शैल चित्र]] राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "''मेवाड़ का मैराथन''" कहा है। मेवाड़ के उत्तरी छोर का दिवेर का नाका अन्य नाकों से विलक्षण है। इसकी स्थिति मदारिया और कुंभलगढ़ की पर्वत श्रेणी के बीच है। प्राचीन काल में इस पहाड़ी क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहारों का आधिपत्य था, जिन्हें इस क्षेत्र में बसने के कारण मेर कहा जाता था।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=177|language=en}}</ref> यहां की उत्पत्यकाताओं में इस जाति के निवास स्थलों के कई अवशेष हैं। मध्यकालीन युग में देवड़ा जाति के राजपूत यहां प्रभावशील हो गये, जिनकी बस्तियां आसपास के उपजाऊ भागों में बस गई और वे उदयपुर के निकट भीतरी गिर्वा तक प्रसारित हो गई। चीकली के पहाड़ी भागों में आज भी देवड़ा राजपूत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। देवड़ाओं के पश्चात यहां रावत शाखा के राजपूत बस गये।<ref>भवान सिंह राणा द्वारा ''"महाराणा प्रताप"''. p.81 {{ISBN|978-8128808258}}</ref> इन विभिन्न समुदायों के दिवेर में बसने के कई कारण थे। प्रथम तो दिवेर का एक सामरिक महत्व रहा है, जो समुदाय शौर्य के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, वे उत्तरोत्तर अपने पराक्रम के कारण यहां बसते रहे और एक-दूसरे पर प्रभाव स्थापित करते रहे। दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि इसकी स्थिति ऐसे मार्गों पर है, जहां से मारवाड़, मालवा, गुजरात, अजमेर के आदान-प्रदान की सुविधा रही है। ये मार्ग तंग घाटियों वाले उबड़-खाबड़ मार्ग के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इनके साथ सदियों से आवागमन होने से घोड़ों की टापों के चिन्ह पत्थरों पर अद्यावधि विद्यमान है। मार्गों में पानी की भी कमी नहीं है, जिसके लिये जगह-जगह झरनों के बांध के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से स्थान-स्थान पर चौकियों के ध्वंसाशेष भी दिखाई देते हैं। जब अकबर ने कुंभलगढ़, देवगढ़, मदारिया आदि स्थानों पर कब्जा कर लिया तो वहां की चौकियों से संबंध बनाए रखने के लिए दिवेर का चयन एक रक्षा स्थल के रूप में किया गया। यहां बड़ी संख्या में घुड़सवारों और हाथियों का दल रखा गया। इंतर चौकियों के लिए रसद भिजवाने का भी यह सुगम स्थान था।<ref>{{Cite web|url=https://www.goodreads.com/work/best_book/25072560-a-history-of-the-modern-world|title=A History Of The Modern World|website=www.goodreads.com|access-date=2020-11-24}}</ref> ज्यों महाराणा प्रताप छप्पन के पहाड़ी स्थानों में बस्तियां बसाने और मेवाड़ के समतल भागों में खेतों को उजाड़ने में व्यस्त थे त्यों अकबर दिवेर के मार्ग से उत्तरी सैनिक चौकियों का पोषण भेजने की व्यवस्था में संलग्न रहा। प्रताप की नीतियों छप्पन की चौकियों को हटाने में तथा मध्यभागीय मेवाड़ की चौकियों को निर्बल बनाने में अवश्य सफल हो गये, परंतु दिवेर का केंद्र अब भी मुगलों के लिए सुदृढ़ था।<ref>{{Cite web|url=http://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|title="राजस्थान का पर्यटन"|last=प्रभारी|first=निदेशक|date=2017|website=[[राजस्थान सरकार]]|archive-url=http://www.tourism.rajasthan.gov.in/content/dam/rajasthan-tourism/english/pdf/tender-pdf/61.pdf|archive-date=2019-07-19|dead-url=|access-date=2020-11-24}}</ref> इस पृष्ठभूमि में दिवेर का महाराणा प्रताप का व मुगलों का संघर्ष जुड़ा हुआ था। इस युद्ध की तैयारी के लिए प्रताप ने अपनी शक्ति सुदृढ़ करने की नई योजना तैयार की। वैसे छप्पन का क्षेत्र मुगल से युक्त हो चला था और मध्य मेवाड़ में रसद के अभाव में मुगल चौकियां निष्प्राण हो गई थी अब केवल उत्तरी मेवाड़ में मुगल चौकियां व दिवेर के संबंध में कदम उठाने की आवश्यकता थी। इस संबंध में महाराणा ने गुजरात और मालवा की ओर अपने अभियान भेजना आरंभ किया और साथ ही आसपास के मुगल अधिकार क्षेत्र में छापे मारना शुरू कर दिया। इसी क्रम में [[भामाशाह]] ने, जो मेवाड़ के प्रधान और सैनिक व्यवस्था के अग्रणी थे, मालवे पर चढ़ाई कर दी और वहां से 2.3 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियां दंड में लेकर एक बड़ी धनराशि इकट्ठी की। इस रकम को लाकर उन्होंने महाराणा को चूलिया ग्राम में समर्पित कर दी। इसी दौरान जब शाहबाज खां निराश होकर लौट गया था, तो महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इन दोनों स्थानों पर महाराणा का अधिकार होना दिवेर पर कब्जा करने की योजना का संकेत था।<ref>{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/history-of-maharana-pratap-and-battle-of-dewar-marathon-of-mewad-118062600044_1.html|title=दिवेर का महायुद्ध, हल्दीघाटी के बाद यहां महाराणा प्रताप ने हराया था मुगल सेना को, कहा जाता है 'मैराथन ऑफ मेवाड़'...|last=WD|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-11-24}}</ref> अतएव इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए नई सेना का संगठन किया गया। जगह-जगह रसद और हथियार इकट्ठे किए गए। सैनिकों को धन और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। सिरोही, ईडर, जालोर के सहयोगियों का उत्साह परिवर्धित कराया गया। ये सभी प्रबंध गुप्त रीति से होते रहे। मुगलों को यह भ्रम हो गया कि प्रताप मेवाड़ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं। ऐसे भ्रम के वातावरण से बची हुई मुगल चौकियों के सैनिक बेखटके रहने लगे।<ref>{{Cite web|url=https://link.springer.com/openurl?genre=book&isbn=978-1-349-27193-1|title=Defending India {{!}} SpringerLink|website=link.springer.com|language=en-gb|access-date=2020-11-24}}{{Dead link|date=अगस्त 2021 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> जब सब प्रकार की तैयारी हो गई तो महाराणा प्रताप, [[अमर सिंह प्रथम|कु. अमरसिंह]], [[भामाशाह]], चुंडावत, शक्तावत, [[सोलंकी वंश|सोलंकी]], [[परिहार गोत्र|पडिहार,]] [[रावत]] शाखा के [[राजपूत]] और अन्य राजपूत सरदार दिवेर की ओर दल बल के साथ चल पड़े।{{Sfn|Jacques|2006|p=89-90}} दिवेर जाने के अन्य मार्गों व घाटियों में भीलों की टोलियां बिठा दी गई, जिससे मेवाड़ में अन्यत्र बची हुई सैनिक चौकियों का दिवेर से कोई संबंध स्थापित न हो सके।<ref>{{Cite web|url=https://www.indiatoday.in/india/story/maharana-pratap-not-akbar-won-battle-of-haldighati-rajasthan-history-book-1026240-2017-07-25|title=Rajasthan rewrites history: Maharana Pratap, not Akbar, won Battle of Haldighati|last=JaipurJuly 25|first=Sharat Kumar|last2=July 25|first2=2017UPDATED:|website=India Today|language=en|access-date=2020-11-24|last3=Ist|first3=2017 21:58}}</ref> [[चित्र:Maha Rana Pratap Singh.jpg|अंगूठाकार|392x392पिक्सेल|महाराणा प्रताप चित्र।]] अचानक महाराणा की फौज दिवेर पहुंची तो मुगल दल में भगदड़ मच गई। मुगल सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी भाग की तलाश में उत्तर के दर्रे से भागने लगे। महाराणा ने अपने दल के साथ भागती सेना का पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कंटीला तथा ऊबड़-खाबड़ था कि मैदानी युद्ध में अभ्यस्त मुगल सैनिक विथकित हो गए। अन्ततोगत्वा घाटी के दूसरे छोर पर जहां कुछ चौड़ाई थी और नदी का स्त्रोत भी था, वहां महाराणा ने उन्हें जा दबोचा।<ref>{{cite web|title=महाराणा प्रताप सिंह|url=http://www.badaunexpress.com/archives/148102|website=www.badaunaexpress.com|accessdate=9 May 2019}}{{Dead link|date=दिसंबर 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> दिवेर थाने के मुगल अधिकारी सुल्तानखां को कुं. अमरसिंह ने जा घेरा और उस पर भाले का ऐसा वार किया कि वह सुल्तानखां को चीरता हुआ घोड़े के शरीर को पार कर गया। घोड़े और सवार के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराणा ने भी इसी तरह बहलोलखां और उसके घोड़े का काम तमाम कर दिया। एक राजपूत सरदार ने अपनी तलवार से हाथी का पिछला पांव काट दिया। इस युद्ध में विजयश्री महाराणा के हाथ लगी।<ref>{{Cite book|url=http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|title=History of battles and seiges|last=Jacques|first=Tony|publisher=|year=2006|isbn=978-0-313-33536-5|location=|pages=|archive-url=https://web.archive.org/web/20150626120848/http://m.friendfeed-media.com/6e9ec7f58014456d2d5fd015cc8af9d2974509c0|archive-date=2015-07-23}}</ref> यह महाराणा की विजय इतनी कारगर सिद्ध हुई कि इससे मुगल थाने जो सक्रिय या निष्क्रिय अवस्था में मेवाड़ में थे जिनकी संख्या 36 बतलाई जाती है, यहां से उठ गए। शाही सेना जो यत्र-तत्र कैदियों की तरह पडी हुई थी, लड़ती, भिड़ती, भूखे मरते उलटे पांव मुगल इलाकों की तरफ भाग खड़ी हुई।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=QjtuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Sharma|first=Sri Ram|date=1900|publisher=D. A.-V. College Managing Committee|year=|isbn=|location=|pages=117-156|language=en}}</ref> यहां तक कि 1585 ई. के आगे अकबर भी उत्तर - पश्चिम की समस्या के कारण मेवाड़ के प्रति उदासीन हो गया, जिससे महाराणा को अब चावंड में नवीन राजधानी बनाकर लोकहित में जुटने का अच्छा अवसर मिला। दिवेर की विजय महाराणा के जीवन का एक उज्ज्वल कीर्तिमान है। जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। एक अर्थ में हल्दीघाटी का युद्ध में राजपूतो ने रक्त का बदला दिवेर में चुकाया। दिवेर की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि महाराणा के त्याग और बलिदान की भावना के नैतिक बल ने सत्तावादी नीति को परास्त किया। कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=EAl6rgEACAAJ|title=Maharana Pratap|last=Kumar|first=Ajay|date=2007|publisher=|year=|isbn=978-81-88594-18-4|location=|pages=102|language=en}}</ref><ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books/about/Maharana_Pratap.html?id=cHFuAAAAMAAJ|title=Maharana Pratap|last=Bhatt|first=Rajendra Shankar|date=2005|publisher=National Book Trust, India|year=|isbn=978-81-237-4339-4|location=|pages=256-267|language=en}}</ref> जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।<ref>{{Cite web|url=https://www.linkedin.com/pulse/legacy-indias-maharana-pratap-lives-today-stephen-manallack#:~:text=When%20Maharana%20Pratap%20(also%20known,custodians%20of%20this%20great%20lineage.|title=The legacy of India's Maharana Pratap lives on today|website=www.linkedin.com|access-date=2020-11-24}}</ref>
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