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== मोक्ष और उसका साधन == मीमांसा-दर्शन में आत्म-तत्व का प्रतिपादक कोई भी मौलिक सूत्र नहीं है। यद्यपि उत्तरमीमांसा (वेदांत) के '"'''एक एवात्मन: शरीरे भावात्'''" इस सूत्र के भाष्य में '''शंकराचार्य''' ने लिखा है कि "पूर्व-तंत्र" (पूर्वमीमांसा) में आत्मप्रतिपादक सूत्र नहीं है, इस वचन को कहकर आत्म स्वरूप का विवेचन किया है। '''वृत्तिकार''' मत को प्रमाण रूप से उद्धृत करते हुए लिखा है : "'''आत्माभिधानप्रसक्तौ यथात्मास्तित्वं तथा शारीरके वक्ष्याम:'''"। अभिप्राय यह हुआ कि पूर्वमीमांसा भी उत्तरमीमांसा की तरह अद्वय आत्मा को मानकर ही निर्मित हुए हैं, तथापि पूर्वमीमांसा शरीर के अतिरिक्त कर्त्ता-भोक्ता आत्मतत्व को मानकर ही प्रचलित हुआ है, क्योंकि कर्म-सिद्धांत के अंतर्गत "कृतहानि" और "अकृताभ्यागम" निहित है। और यहीं से पुनर्जन्म आदि की सिद्धि भी होती है।''' "चोदना पुनरारंभ:"''' "'''सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणाम्'''" इन दोनों सूत्रों से आत्मबीज का प्रतिपादन किया गया है। और वपन आदि संस्कार फली (फलभोक्ता) का संस्कार (उपचयाधानक्षम) है। पुरुषार्थ में पुरुष शब्द से अस्थि यज्ञ और कृत याग से आत्मा को फल प्राप्ति होती है। '''शबर स्वामी''' ने सूत्र विशेष के बिना ही "यज्ञायुध वाक्य" को निमित्त मानकर अनात्मवादी के मत का खंडन करते हुए आत्मस्वरूप को तर्क और श्रुतियों के द्वारा सिद्ध किया है जिससे वेद प्रामाण्य की भी सिद्धि होती है। उत्तर-मीमांसा में आत्मा को एक ही माना गया है; किंतु "सांख्य योग", न्याय, वैशेषिक और पूर्वमीमांसा में आत्मा को अनेक माना गया है, जिसका कर्म के द्वारा शरीर, इंद्रिय और मन से संबंध होता है। अतएव शरीर, इंद्रिय और विषय को बंध कहा गया है। उक्त त्रय आत्मा को बंधन में डालते हैं, जिससे आत्मा सुखदु:खादि द्वंद्व को भोगता है। नित्य नैमित्तिक कर्मों को कत्र्तव्य बुद्धया करते हुए प्रारब्ध कर्मों को जीव भोगता रहता है। शरीर इंद्रिय से अतिरिक्त जो ब्रह्म बुद्धि से आत्मा की उपासना करता है उसका शरीर इंद्रिय आदि से संबंध का कोई कारण (काम्य और निषिद्ध कर्म) नहीं है, ऐसा व्यक्ति वर्तमान शरीर के नाश के पश्चात् स्व स्वरूप में स्थित हो जाता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार शरीर, इंद्रिय और विषय को बंधन कहा गया है जो अज्ञान का कारण है; उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है। उदाहरणार्थ - " ''निवृतिरात्मा मोहस्य ज्ञातत्वेनोपलक्षित: पूर्वमीमांसा भी यही स्वीकार करता है कि शरीर, इंद्रिय और विषयों का संबंध ही बंधन हैं, तथा उसका विलय ही मोक्ष है, जिसका साधन, ज्ञान (उपासना) और कर्म समुच्चय है। आत्मज्ञान दो प्रकार का होता है। शरीरातिरिक्त आत्मज्ञान ऋतु का अंग होता है, जो नि:श्रेयसकारक है। वैदिक और लौकिक वाक्यों का सहस्रों की संख्या में वाक्यार्थ निर्णयोपयोगी न्यायों का पूर्वमीमांसा ने ही प्रतिपादन किया है। अतएव भारतीय दर्शनों में प्रथम स्थान कर्म प्रतिपादक पूर्वमीमांसा दर्शन का ही है।
सारांश:
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