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== विभिन्न देशों में विधिशास्त्र == देखें, [[तुलनात्मक विधिशास्त्र]] संसार के भिन्न भिन्न देशों में विधिशास्त्र की परिभाषा किंचित् भिन्न भिन्न रूपों में की गई है। [[जर्मनी]] के विधान में विधिशास्त्र कानून का मोटामोटी वह पर्याय है, जिसका लक्ष्य वैज्ञानिक अध्ययन होता है। [[फ़्रान्स|फ्रांस]] के विधान में इससे न्यायालय के क्षेत्राधिकार का बोध होता है, जो कानून के "कोड" की विकृति एव विकास करता है। [[ब्रिटेन|अंग्रेजी]] एवं [[संयुक्त राज्य अमेरिका|अमरीकी]] विधान में सन्निहित हैं। === सनातन भारतीय विधान === सनातन भारतीय विधान में विधिशास्त्र धर्मशास्त्र पर आधारित है। "धर्म" की परिभाषा निम्नलिखित रूप में की गई है: ''श्रुति: स्मृति. सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:'' और ''एतच्चतुर्विधं प्राहू: साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम'' अर्थात् वेद, स्मृति, सदाचार एवं सुनीति धर्म के उद्गम हैं। "धर्म" व्यापक शब्द है। धार्मिक, नैतिक, सामाजिक एवं वैधानिक दृष्टि से यह मनुष्य के कर्तव्य एवं दायित्व की समष्टि है। धार्मिक एवं धर्म निरपेक्ष भावना के बीच विभाजन रेखा स्थापित नहीं की जा सकती, क्योंकि कितने ही विषय ऐसे हैं जो धार्मिक एवं सांसारिक दोनों हैं। भारत का [[सनातन धर्म]] राजा अथवा शासक के आदेश पर आधारित नहीं है। इसकी मान्यता (Sanction) इसी में अंतर्निहित है। [[स्मृति]]कारों और उनके पूर्वजों ने कहा है कि "धर्म भगवान की देन है। यह राजाओं का राजा है। इससे अधिक शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं। इसकी सहायता से शक्तिहीन भी शक्तिशाली से अपना अधिकार ले सकते हैं। राजा न्याय का निर्माता नहीं, केवल इसका पालक है।" ([[शतपथ ब्राह्मण]] 14-4.2.26) विधिवेत्ता [[ऑस्टिन, टेक्सास|ऑस्टिन]] किंवा [[जेरेमी बेन्थम|बेंथम]] के सिद्धांत के अनुसार सनातन धर्म का अधिकांश नैतिकता में संनिविष्ट हो जाएगा, क्योंकि यह "धर्म" किसी राजा अथवा सार्वभौम सत्ताप्राप्त शासक का आदेश नहीं है। यह सत्य है कि स्मृति अपने तईं कानून नहीं है, क्योंकि इसे न तो व्यवस्थापिका सभा ने बनाया और न राज्य ने घोषित किया। पर यह '''जस रिसेप्टम''' (Jus Receptum) के सिद्धांत पर मान्य था अर्थात् समाज ने इसे ग्रहण कर लिया था। अत: एक मत के अनुसार [[स्मृति]] के कानून का उद्गम समाज ही है। इसका एक अंश नैतिक आदेश है, जिसका स्रोत नैसर्गिक माना गया है एवं अवशेष परंपरा एवं सदाचार है। स्मृतिकारों के व्यक्तित्व एवं सम्मान तथा सुनीति पर आधारित होने के कारण स्मृति के वचनों की मान्यता ही इनके वैधानिक व्यादेश का प्राधिकार है। [[चाणक्य|कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र]] के प्रामाणिक संस्करण प्रकाशित होने पर यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि भारत में राजनिर्मित विधान धर्मशास्त्र द्वारा घोषित विधान से किसी समय अधिक मान्य था या नहीं। कौटिल्य ने कहा है कि विधान चार स्तंभों पर आधारित है: धर्म, व्यवहार, चरित्र एवं, राजशासन इनमें परवर्ती आधार क्रमागत पूर्व के आधार से अधिक शक्तिशाली है किंतु यह स्मरणीय है कि राजशिलालेख (Edicts) द्वारा धर्मशास्त्र में कथित किसी भी मौलिक आदेश अथवा व्यवहार का उल्लंघन नहीं हुआ। कौटिल्य ने भी सैद्धांतिक रूप में यह स्वीकार किया था कि राजनिर्मित विधान धर्मशास्त्र की परिधि से बाहर नहीं है।
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