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=== प्रथम भाव मे शनि === [[शनि]] मन्द है और [[शनि]] ही ठंडक देने वाला है,[[सूर्य]] नाम उजाला तो [[शनि]] नाम अन्धेरा, पहले भाव मे अपना स्थान बनाने का कारण है कि [[शनि]] अपने [[गोचर]] की गति और अपनी [[दशा]] मे [[शोक]] पैदा करेगा,[[जीव]] के अन्दर [[शोक]] का [[दु:ख|दुख]] मिलते ही वह आगे पीछे सब कुछ भूल कर केवल अन्धेरे मे ही खोया रहता है।[[शनि]] [[जादू टोने]] का कारक तब बन जाता है, जब [[शनि]] पहले भाव मे अपनी गति देता है, पहला भाव ही [[औकात]] होती है, अन्धेरे मे जब औकात छुपने लगे, रोशनी से ही पहिचान होती है और जब [[औकात]] छुपी हुई हो तो शनि का स्याह अन्धेरा ही माना जा सकता है। अन्धेरे के कई रूप होते हैं, एक अन्धेरा वह होता है जिसके कारण कुछ भी दिखाई नही देता है, यह आंखों का अन्धेरा माना जाता है, एक अन्धेरा समझने का भी होता है, सामने कुछ होता है, और समझा कुछ जाता है, एक अन्धेरा बुराइयों का होता है, व्यक्ति या जीव की सभी अच्छाइयां बुराइयों के अन्दर छुपने का कारण भी शनि का दिया गया अन्धेरा ही माना जाता है, नाम का अन्धेरा भे होता है, किसी को पता ही नही होता है, कि कौन है और कहां से आया है, कौन [[माता|माँ]] है और कौन [[पिता|बाप]] है, आदि के द्वारा किसी भी रूप मे छुपाव भी [[शनि]] के कारण ही माना जाता है, व्यक्ति चालाकी का [[पुतला]] बन जाता है प्रथम भाव के [[शनि]] के द्वारा.शनि अपने स्थान से प्रथम भाव के अन्दर स्थिति रख कर तीसरे भाव को देखता है, तीसरा भाव अपने से छोटे भाई बहिनो का भी होता है, अपनी अन्दरूनी [[ताकत]] का भी होता है, पराक्रम का भी होता है, जो कुछ भी हम दूसरों से कहते है, किसी भी साधन से, किसी भी तरह से शनि के कारण अपनी बात को संप्रेषित करने मे कठिनाई आती है, जो कहा जाता है वह सामने वाले को या तो समझ मे नही आता है, और आता भी है तो एक भयानक अन्धेरा होने के कारण वह कही गयी बात को न समझने के कारण कुछ का कुछ समझ लेता है, परिणाम के अन्दर फ़ल भी जो चाहिये वह नही मिलता है, अक्सर देखा जाता है कि जिसके प्रथम भाव मे [[शनि]] होता है, उसका [[जीवन साथी]] जोर जोर से बोलना चालू कर देता है, उसका कारण उसके द्वारा जोर जोर से बोलने की आदत नही, प्रथम भाव का [[शनि]] सुनने के अन्दर कमी कर देता है, और सामने वाले को जोर से बोलने पर ही या तो सुनायी देता है, या वह कुछ का कुछ समझ लेता है, इसी लिये जीवन साथी के साथ कुछ सुनने और कुछ समझने के कारण [[मानसिक]] ना समझी का परिणाम सम्बन्धों मे कडुवाहट घुल जाती है, और [[सम्बन्ध]] टूट जाते हैं। इसकी प्रथम भाव से दसवी नजर सीधी [[कर्म]] भाव पर पडती है, यही [[कर्म]] भाव ही [[पिता]] का भाव भी होता है।[[जातक]] को [[कर्म]] करने और [[कर्म]] को समझने मे काफ़ी कठिनाई का सामना करना पडता है, जब किसी प्रकार से [[कर्म]] को नही समझा जाता है तो जो भी किया जाता है वह [[कर्म]] न होकर एक [[भार]] स्वरूप ही समझा जाता है, यही बात [[पिता]] के प्रति मान ली जाती है,[[पिता]] के प्रति [[शनि]] अपनी सिफ़्त के अनुसार [[अंधेरा]] देता है, और उस अन्धेरे के कारण [[पिता]] ने [[बेटा|पुत्र]] के प्रति क्या किया है, समझ नही होने के कारण [[पिता]] [[बेटा|पुत्र]] में अनबन भी बनी रहती है,[[बेटा|पुत्र]] का लगन या [[प्रथम भाव]] का [[शनि]] माता के चौथे भाव मे चला जाता है, और माता को जो काम नही करने चाहिये वे उसको करने पडते हैं, कठिन और एक [[सीमा]] मे रहकर माता के द्वारा काम करने के कारण उसका [[जीवन]] एक घेरे में बंधा सा रह जाता है, और वह अपनी शरीरी सिफ़्त को उस प्रकार से प्रयोग नही कर पाती है जिस प्रकार से एक साधारण आदमी अपनी [[जिन्दगी]] को जीना चाहता है।
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