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==हिन्दी साहित्य में सत्यार्थ प्रकाश == यद्यपि स्वामी दयानन्द की मातृभाषा [[गुजराती भाषा|गुजराती]] थी और [[संस्कृत]] का इतना ज्ञान था कि संस्कृत में धाराप्रवाह बोल लेते थे, तथापि इस ग्रन्थ को उन्होंने [[हिन्दी]] में रचा। कहते हैं कि जब स्वामी जी 1872 में [[कलकत्ता]] में [[केशवचन्द्र सेन]] से मिले तो उन्होंने स्वामी जी को यह सलाह दी कि आप [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] छोड़कर हिन्दी बोलना आरम्भ कर दें तो भारत का असीम कल्याण हो। तभी से स्वामी जी के व्याख्यानों की भाषा हिन्दी हो गयी और शायद इसी कारण स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश की भाषा भी हिन्दी ही रखी। स्वामी जी पूरे देश में घूम-घूमकर [[शास्त्रार्थ]] एवं व्याख्यान कर रहे थे। इससे उनके अनुयायियों ने अनुरोध किया कि यदि इन शास्त्रार्थों एवं व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर दिया जाय तो ये अमर हो जायेंगे। सत्यार्थ प्रकाश की रचना उनके अनुयायियों के इस अनुरोध के कारण ही सम्भव हुई। [[हिन्दी साहित्य]] के इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी के उन प्रारंभिक ग्रंथों में माना है, जिनके गद्य की शैली को बाद में सभी ने परम्परा के रूप में ग्रहण किया। सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन से पहले हिंदी गद्य की भाषा [[ब्रजभाषा]] और [[अवधी]] से बहुत अधिक प्रभावित थी। [[आचार्य रामचंद्र शुक्ल]] ने हिंदी साहित्य का इतिहास में माना है कि 1868 से 1893 का कालखंड हिंदी गद्य के विकास का समय था। डॉ. चंद्रभानु सीताराम सोनवणे ने हिंदी गद्य साहित्य में लिखा है कि सत्यार्थ प्रकाश आधुनिक हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। हिंदी को नई चाल में ढालने में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्थान [[भारतेंदु हरिश्चंद्र]] से कम नहीं है।<ref>[https://www.bhaskar.com/news/136-years-ago-udaipur-was-written-in-the-first-volume-of-modern-hindi-39satyarth-prakash39-the-author-was-swami-dayanand-saraswati-032050-2723154.html 136 साल पहले उदयपुर में लिखा गया था आधुनिक हिंदी का पहला ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ]</ref>
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