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== भारतीय क्लासिक साहित्य == ‘क्लासिक’ की रूढ़ परिभाषा के अंतर्गत यूनानी और रोमन साहित्य और उनके परिप्रेक्ष्य में यूरोपीय साहित्य की ही चर्चा ऊपर की गई है। उपर्युक्त साहित्य के संदर्भ में [[ह्यूम]] ने यह प्रश्न उठाया कि [[होमर]] आज से हजार-दो हजार साल पूर्व [[रोम]] और [[एथेंस]] पढ़े जाते थे और आज भी वे [[लंदन]] और [[पेरिस]] में पढ़े जाते हैं। अनेक विभिन्नताओं और परिवर्तनों के होते हुए भी आज तक उनका महत्त्व बना हुआ है इसका क्या कारण है? इस प्रश्न के उत्तर में यह अनुभव किया गया कि जो साहित्य काल की कसौटी पर खरा उतरे वही ‘क्लासिक' है। अतएव अब यह समझा जाने लगा है कि क्लासिक साहित्य वह है जिसमें जीवन के उन तत्वों का समावेश निश्चित रूप से हो जिनकी उपयोगिता और सार्थकता प्रत्येक युग और देश के लिये अपरिहार्य है। भारतीय साहित्य को ‘क्लासिक’ की इसी परिभाषा की दृष्टि से देखा जा सकता है। इस दृष्टि से देखने पर [[रामायण]] और [[महाभारत]] तो क्लासिक की कोटि में आते ही हैं। [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के अनेक काव्यों और महाकाव्यों की गणना उसके अंतर्गत की जा सकती है। [[कालिदास]] का समग्र साहित्य अपने आप में क्लासिक है किंतु ‘[[रघुवंश]]’ और ‘[[अभिज्ञान शाकुतंल]]’ सर्वोपरि हैं। हिंदी का साहित्यिक इतिहास अभी कुछ ही सौ बरसों का है। इस बीच जिस प्रकार का साहित्य रचा गया उसने अधिकांशत: संस्कृत के साहित्यशास्त्र के उन्हीं केंद्र बिंदुओं को अपनाया जिन्हें रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति और अलंकार कहते हैं। इस काल के लेखकों के प्रेरणास्रोत थे संस्कृत के ह्रासोन्मुख साहित्यिक आचार्य। अत: उस काल में ऐसा बहुत नहीं है जिसे क्लासिक कहा जाय। अकेले [[तुलसीदास]] के [[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]] को इस कोटि में रखा जा सकता है। आचार्य [[रामचन्द्र शुक्ल|रामचंद्र शुक्ल]] ने यों सूर और जायसी की रचनाओं का क्लासिक माना है। निओ-क्लासिक के रूप में [[प्रेमचंद]] के [[गोदान (उपन्यास)|गोदान]] और [[जयशंकर प्रसाद]] की ‘[[कामायनी]]’ की गणना की जा सकती है। [[श्रेणी:साहित्य]]
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