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=== अधिकारियों की मनोवैज्ञानिक भूमिका === अधिकारियों को कर्मचारियों के सम्पर्क में रहना चाहिए, उन्हें उद्योग में एक इकाई के रूप में मानना चाहिए। इससे आपसी मतभेद, घृणा, द्वेष आदि को कम किया जा सकता है। कर्मचारी भी अधिकारियों की तरह एक सम्भ्रांत व्यक्ति होता है, उसकी भी अपनी मान-प्रतिष्ठा होती है। अधिकारी ऐसा व्यवहार न करे जिससे कर्मचारी यह महसूस करे कि उसे अलग समझा जा रहा है या उससे दबाब पूर्वक कार्य लिया जा रहा है। अधिकारी को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि कर्मचारी की भी अपनी इच्छाएं होती हैं। वे उद्योग में एक महान शक्ति के रूप में हैं। यह संगठन ही उद्योग की भलाई और उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसलिए अधिकारियों व मालिकों को इस संगठन के लिए अच्छे विचार रखने चाहिए जिससे संगठन के अंदर बुरी भावनाएं पैदा न हों। विपरीत जा रहे कर्मचारियों को सही मार्ग-दर्शन देना चाहिए, उनके बीच में विचार गोष्ठी का आयोजन करना चाहिए तथा उनके विचारों को सही दिशा देनी चाहिए। कर्मचारियों के हित की बात अधिकारियों को सोचनी चाहिए तथा उनकी उचित मांगों को ध्यान में रखना चाहिए। कर्मचारियों की मांग वेतन, लाभांश आदि से सम्बंधित होती हैं। अपनी चिकित्सा और निवास सम्बंधी मांगों को भी वे महत्व देते हैं। वे समाजोत्थान की बात भी करते हैं लेकिन उद्योग में अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं। तोड़-फोड़, अनशन, हड़ताल आदि सिलसिला चलता रहता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में ही प्रबंधकों, मालिकों तथा अधिकारियों को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। कर्मचारी की वृत्तियों तथा मांगों को गम्भीरता से लेना चाहिए। यह याद रहे कि मूल्यवृद्धि के साथ मंहगाई भत्ते की मांग भी उचित है। ऐसी परिस्थितियों में अधिकारियों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के साथ विचार गोष्ठी रखें और आपसी विचार-विमर्श द्वारा एक-दूसरे को समझें तथा समझौते के द्वारा समस्या का हल निकालें। हमेशा सही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अधिकारियों की योग्यता एवं गुण इसी बात का परिचालक है कि वे नजदीक से एक-दूसरे को समझें।
सारांश:
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